सवाईमाधोपुर। कभी रणथम्भौर और टोंक के जंगलों में आसानी से नजर आने वाले काले हिरण अब वन्यजीव गणना में भी नहीं दिख रहे हैं। इन इलाकों से काले हिरण लगभग गायब हो चुके हैं। वन विभाग की ओर से संरक्षण के लिए बजट जारी होने के बावजूद धरातल पर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं।
वन्यजीव गणना के अनुसार टोंक जिले के रानीपुरा क्षेत्र में कभी काले हिरणों की संख्या 1500 तक रही थी, लेकिन समय के साथ इनकी संख्या लगातार घटती गई। 2007 में 666, 2008 में 690, 2009 में 708, 2010 में 750, 2011 में 300, 2012 में 321 काले हिरण दर्ज किए गए। 2016-17 की गणना में संख्या मात्र 65 रह गई। 2018 में 31 और 2019 में 57 काले हिरण नजर आए। यह गिरावट इस प्रजाति के संकट की स्थिति को स्पष्ट करती है।
कम होने के कारण
विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों का कम होना, खेती का विस्तार और वर्ष में दो बार फसल तैयार होना प्रमुख कारण है। पानी की कमी के चलते हिरण इधर-उधर भटकते हैं और कुत्तों व अन्य वन्यजीवों का शिकार बन जाते है। नर की संख्या मादा की तुलना में कम होना भी चिंताजनक है। इसके अलावा शिकार भी इनकी संख्या घटने का बड़ा कारण है।
धौलपुर में पहली बार उपस्थिति
वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार हाल ही में वाटर हॉल पद्धति से की गई गणना में धौलपुर के जंगलों में करीब 40 काले हिरण नजर आए। यहां पहले कभी काले हिरण नहीं पाए गए थे। माना जा रहा है कि ये संभवतः मध्यप्रदेश से यहां आए हैं।
रणथम्भौर में स्थिति
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि रणथम्भौर में सामान्यतः काले हिरण नहीं पाए जाते थे, लेकिन कई साल पहले खण्डार और बोदल क्षेत्र में कभी-कभी नजर आते थे। अब इन क्षेत्रों में भी इनकी उपस्थिति नगण्य हो गई है।
अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय
टोंक एसीएफ अनुराग महर्षि ने बताया कि पिछले दो-तीन वर्षों से काले हिरण नजर नहीं आ रहे थे, लेकिन इस बार की गणना में सकारात्मक संकेत मिले हैं। हालांकि अंतिम रिपोर्ट अभी आना बाकी है। वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेन्द्र खाण्डल का कहना है कि रानीपुरा क्षेत्र में पहले बड़ी संख्या में काले हिरण पाए जाते थे, लेकिन अब स्थिति बेहद चिंताजनक है। इंसानी आबादी बढ़ना, तारबंदी और शिकार इसके मुख्य कारण हैं। उन्होंने वन विभाग से संरक्षण के लिए ठोस प्रयास करने की आवश्यकता बताई।