सिरोही। भटाना नगर में मुमुक्षु सीए कोमल कुमारी परमार ने संयम पथ अपनाते हुए साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी का नया नाम ग्रहण किया। यह दीक्षा महोत्सव सूरिमंत्र समाराधक आचार्य रविरत्नसूरीश्वर के पावन सान्निध्य में विशाल जनसमुदाय के बीच संपन्न हुआ।
कोमल कुमारी अपने घर से प्रस्थान कर मंदिर पहुंचीं और भगवान शांतिनाथ की अंतिम पूजा की। इसके बाद उन्होंने युगादि संयम वाटिका में प्रवेश किया। माता मंजुला बेन और पिता पुखराज परमार सहित परिवारजनों ने ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद देकर उन्हें संयम पथ पर विदा किया।
पूजन कर दीक्षा की मंगल क्रिया प्रारंभ हुई
गुरु भगवंतों का पूजन कर दीक्षा की मंगल क्रिया प्रारंभ हुई। भगवान के नाल के समक्ष तीन प्रदक्षिणा देने के बाद रजोहरण (ओघा) ग्रहण करने के लिए गुरुमुख से ‘मय मुंडावेहं, मम पव्वावेह, मम बेसं समप्पेह’ के तीन आदेश मांगे गए। शुभ मुहूर्त में रजोहरण अर्पित करते ही कोमल उत्साह से झूम उठीं, जिस पर भक्तों ने अक्षतों से उनका ‘बधावणा’ किया।
उनके नूतन नाम साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी की उद्घोषणा उनकी सांसारिक बुआ रसीला बेन मिलापचंद, उर्मिला बेन भंवरलाल और संगीता बेन शशिकांत ने उदारता से चढ़ावा लेकर की। नाम उद्घोषित होते ही पूरे पंडाल में तालियों की गूंज उठी और साध्वीजी की जय-जयकार करते हुए अक्षतों से ‘वधामणा’ किया गया।
कोमल में छिपे वैराग्य भाव की सराहना
इस पावन प्रसंग पर आचार्य भाग्येशसूरीश्वर और शीलरत्नसूरीश्वर भी उपस्थित रहे। आचार्य भाग्येशसूरीश्वर ने अपने संबोधन में कहा कि परमात्मा के प्रति सम्मोहन होना ही दीक्षा ग्रहण करना है। उन्होंने कोमल में छिपे वैराग्य भाव की सराहना करते हुए कहा कि भौतिक चकाचौंध से दूर हटकर उन्होंने संयम का मार्ग अपनाया है। नवदीक्षित साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी, प्रवर्तिनी साध्वी पुण्यरेखाश्रीजी के परिवार में शामिल होने वाली 498वीं शिष्या बनी हैं। भटाना गांव में यह नौवीं दीक्षा थी, जिसमें ग्रामवासी, श्रेष्ठिवर्य और श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे।
इससे पहले मुमुक्षु कोमल कुमारी जैन (परमार) का भव्य वर्षीदान वरघोड़ा निकला गया था। बग्गी में बैठकर कोमल ने अपनी माता मंजुला बेन परमार परिवार के साथ दीक्षा से पूर्व कई वस्तुओं का उदारता व उल्लासपूर्वक दान कर वर्षीदान किया था। यह वरघोड़ा नगर में घूमकर जैन मंदिर पहुंचा, जहां धर्मसभा का आयोजन किया गया था। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य रविरत्नसूरीश्वर ने कहा था कि दीक्षा देने वाले व ग्रहण करने वाले दोनों प्रशंसा के पात्र हैं।