आर्कियोलॉजिकल साइट पर बना पहला म्यूजियम, यहां साक्ष्यों के साथ जिंदा है सभ्यता का अतीत

विश्व विरासत दिवस विशेष: आहड़ सभ्यता में आज भी जीवित है मेवाड़ का गौरवशाली अतीत- हजारों साल पुरानी सभ्यता के साक्ष्य आज भी मौजूद, आयड़ में जीवित है मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की विरासत

उदयपुर. विश्व विरासत दिवस के अवसर पर मेवाड़ की धरती पर बसी आहड़ सभ्यता आज भी इतिहास के उन अनमोल अध्यायों को संजोए हुए है। ये हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक समृद्धि की कहानी कहते हैं। लगभग 4000 वर्ष प्राचीन यह सभ्यता ताम्र-पाषाण कालीन संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र रही है, इसने मेवाड़ की पहचान को ऐतिहासिक गहराई प्रदान की है। इन समृद्ध विरासतों के साथ आयड़ संग्रहालय राजस्थान पुरातत्व विभाग का ऐसा पहला संग्रहालय है, जो सीधे उत्खनन स्थल के निकट स्थापित किया गया है, जहां मूल साक्ष्यों के साथ इतिहास को करीब से देखा जा सकता है। जहां संरक्षित धरोहरें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की झलक प्रस्तुत करती हैं।

संपन्न थी 4000 वर्ष पुरानी सभ्यता

आयड़ सभ्यता को भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीनतम बस्तियों में गिना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह सभ्यता ताम्र-पाषाण युग से संबंधित है, जहां मानव ने पत्थर और तांबे दोनों का उपयोग करना शुरू कर दिया था। यहां मिले अवशेष बताते हैं कि उस समय के लोग संगठित जीवन, कृषि और शिल्पकला में दक्ष थे।

टेराकोटा और बी एन्ड आर मृदभांडों की विशेषता

आयड़ क्षेत्र की खुदाई में पक्की मिट्टी (टेराकोटा) के मनके (बड़े घड़े) और सैकड़ों प्रकार के पुराने बर्तन मिले हैं। इनमें ब्लैक एंड रेड वेयर (बी एंड आर) खास हैं, जो काले और लाल रंग के होते हैं। इन पर सफेद रंग से सजावट भी की गई है। इसके अलावा यहां से कई उपयोगी वस्तुएं भी मिली हैं, जैसे बड़े भंडारण पात्र, दो घड़ों वाले बर्तन, दो मुंह वाले चूल्हे और पत्थर के सिल बट्टे।

पाषाण प्रतिमाएं और धार्मिक आस्था के प्रमाण

आयड़ क्षेत्र से प्राप्त पाषाण निर्मित प्रतिमाएं भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें उमा-महेश्वर, विष्णु, सूर्य सहित विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां शामिल हैं। ये प्रतिमाएं उस समय की धार्मिक आस्था, कला कौशल और स्थापत्य परंपरा को उजागर करती हैं। विभिन्न प्रकार के हथियार और पाषाण कालीन पत्थरों से निर्मित औजार भी मिले हैं। ये उपकरण उस समय के लोगों की तकनीकी समझ, शिकार और दैनिक जीवन की गतिविधियों का प्रमाण हैं।

1961-62 में हुआ ऐतिहासिक उत्खनन

आयड़ सभ्यता की महत्ता को उजागर करने में 1961-62 में किए गए उत्खनन का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह कार्य राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग और प्रख्यात पुरातत्वविद प्रोफेसर एच.डी. सांकलिया के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं ने इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि को विश्व पटल पर स्थापित किया।

1968 में स्थापित हुआ संग्रहालय

उत्खनन से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री और प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए वर्ष 1968 में आयड़ संग्रहालय की स्थापना की गई। यहां आज भी हजारों वर्ष पुराने अवशेष संरक्षित हैं, जो शोधकर्ताओं और पर्यटकों को मेवाड़ के गौरवशाली अतीत से परिचित कराते हैं।

नया लुक देकर बना रहे आकर्षक

आयड़ संग्रहालय को नए और आधुनिक स्वरूप में विकसित करने के लिए जीर्णोद्धार कार्य तेजी से जारी है। संग्रहालय में संरक्षित पुरावशेषों के बेहतर संरक्षण, डिस्प्ले और विजिटर्स के अनुभव को अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से नई तकनीकों और प्रदर्शनी व्यवस्था को शामिल किया जा रहा है।—

… पर ये प्रयास भी नाकाफी

हालांकि आहड़ सभ्यता को संरक्षित करने और इसके ऐतिहासिक महत्व को सामने लाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन ये प्रयास अभी भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। हजारों साल पुरानी इस महत्वपूर्ण धरोहर के बावजूद यहां पर्यटकों की आवाजाही बेहद सीमित है, इससे यह स्थल वह पहचान नहीं पा सका है जिसका यह वास्तविक हकदार है।