अस्थिरता और असंतोष से जूझती बालेंद्र शाह सरकार

रवि शंकर स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार – नेपाल की राजनीति में उथल-पुथल का दौर जारी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और सुशासन के वादे के साथ सत्ता में आई बालेंद्र शाह सरकार फिलहाल सवालों के कठघरे में है। महज एक महीने के भीतर भ्रष्टाचार और नैतिकता के आधार पर दो कैबिनेट मंत्रियों के इस्तीफे ने बालेंद्र शाह सरकार की स्थिरता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे पहले श्रम मंत्री दीपक कुमार साह को स्वास्थ्य बीमा बोर्ड में अपनी पत्नी के लिए पद सुरक्षित करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के आरोप में मजबूर होकर पद छोडऩा पड़ा। दीपक कुमार साह को शपथ लेने के महज 13 दिन बाद ही अपनी ही पार्टी के दबाव के चलते इस्तीफा देना पड़ा। उनके बाद अब नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने भी भ्रष्टाचार के मामले में नाम आने के बाद इस्तीफा दिया है। सुदन गुरुंग, बालेंद्र शाह के अहम सहयोगी माने जाते हैं। फिलहाल, दो मंत्रियों के भ्रष्टाचार के आरोप में इस्तीफे ने पीएम बालेंद्र शाह की छवि को नुकसान पहुंचाया है। यह उनके सहयोगियों के चयन में उनकी अनुभवहीनता को उजागर करता है। योग्य और सक्षम उम्मीदवारों के वादे से परे जाकर, उन्होंने ऐसे कैबिनेट सहयोगियों को चुना जो पसंदीदा और उनके इशारों पर चलने वाले थे।

रैपर से नेता बने 35 वर्षीय बालेंद्र शाह बीते महीने हुए संसदीय चुनावों में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए थे। उनकी पार्टी, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने भ्रष्टाचार नियंत्रण और पारदर्शिता का वादा किया था। काठमांडू के मेयर के रूप में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान सुधारवादी कार्यों से लोकप्रियता हासिल करने वाले शाह ने पद संभालते ही 100 सूत्रीय सुधार एजेंडा जारी किया था। इसके तहत हाल में सर्वो’च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश के नेतृत्व में राजनेताओं की संपत्ति की जांच के लिए पांच सदस्यीय आयोग का गठन किया गया है। ऐसे में अब इस बात पर संदेह उठने लगे हैं कि क्या नया नेतृत्व अपने वादे पूरे कर रहा है। मालूम हो, सितंबर 2025 में नेपाल में तत्कालीन केपी ओली सरकार के खिलाफ जेन-जी ने विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ था जो देखते ही देखते हिंसक हो गया और तत्कालीन सरकार को सत्ता से हटा दिया गया। इसके बाद चुनाव के जरिये देश के युवाओं ने बालेंद्र शाह की सरकार को चुना। हालांकि, सरकार के बनने के बाद से लेकर अब तक बालेंद्र शाह की सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जिसकी वजह से देश में राजनीतिक असंतोष पैदा हो गया है। शाह की सरकार ने हाल में नेपाल-भारत सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने का ऐलान किया। इस फैसले का जमकर विरोध हो रहा है। भारत से नेपाल लाए जाने वाले 100 रुपए से अधिक के सामान पर यह कस्टम ड्यूटी लगाई गई। शाह सरकार के इस फैसले से जनता में भयंकर आक्रोश देखने को मिल रहा है। यह विवाद केवल एक फैसले को लेकर नहीं हो रहा है, बल्कि आर्थिक फैसलों, गवर्नेंस की चिंताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों ने लोगों की नाराजगी को हवा दी है। गौर करने वाली बात यह है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में नेपाल वर्तमान में 180 देशों में 109वें स्थान पर है, जिसे सुधारना शाह सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जेन-जी के पसंद की सरकार से लोगों की नाराजगी के पीछे एक और बड़ा कारण सरकार का राजनीतिक पार्टियों से जुड़े स्टूडेंट यूनियन को साइडलाइन करने या उन पर रोक लगाने का कदम भी माना जा रहा है। पीएम बालेंद्र शाह ने शपथ लेने के तुरंत बाद ही छात्र राजनीति पर पूरी तरह से रोक लगाने का फैसला सुना दिया। इस फैसले से युवाओं में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।

बहरहाल, नेपाल की राजनीति में हालिया घटनाक्रम ने नई सरकार को लेकर उत्साह के साथ-साथ अनिश्चितता भी बढ़ा दी है। केपी ओली सरकार के पतन के बाद हुए संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की जीत के साथ बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनी, लेकिन गठन के कुछ ही समय के भीतर दो मंत्रियों के इस्तीफे ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि युवाओं के समर्थन से बनी यह सरकार क्या जनता की उम्मीदों पर खरी उतर पाएगी और देश की प्रमुख चुनौतियों का समाधान कर सकेगी या नहीं। फिलहाल हालात को देखते हुए सवाल फिर वही उठता है कि आखिर बालेंद्र शाह की सरकार लोगों की मुद्दों को समझकर उसका सही हल निकाल पाएगी या एक बार फिर से नेपाल में सितंबर 2025 की कहानी दोहराई जाएगी।