राजस्थान के किसानों के लिए वरदान बनी ये नई तकनीक, कम लागत में ऐसे कमाएं बंपर मुनाफा; एक्सपर्ट्स ने दिए टिप्स

गडरारोड (बाड़मेर): पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों में खेती अब केवल पारंपरिक ढर्रे तक सीमित नहीं रही। आधुनिक तकनीक, जैविक खाद और फसलों के मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) ने प्रगतिशील खेती के नए द्वार खोल दिए हैं। कृषि विज्ञान केंद्र (श्योर) दांता, बाड़मेर की ओर से ग्राम रोहिड़ी में संतुलित उर्वरक अभियान एवं खरीफ किसान गोष्ठी में विभिन्न विषय विशेषज्ञों ने किसानों को आधुनिक और उन्नत कृषि तकनीकों की जानकारी दी।

किसानों को बताया कि किस तरह कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। बागवानी विशेषज्ञ बुधाराम मोरवाल ने किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने जीवामृत, बीजामृत और नीमास्त्र तैयार करने की विधियां बताई। इसके साथ ही किसानों को कुम्मट से गोंद उत्पादन की तकनीक और बेर उत्पादन की उन्नत तकनीकी जानकारी भी दी गई।

उन्नत किस्में और डिजिटल कृषि

केंद्र के कृषि प्रसार विशेषज्ञ हंसराज सैन ने खरीफ फसलों की उन्नत किस्मों के बारे में बताया। उन्होंने वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र में सोशल मीडिया के उपयोग और उसके लाभों पर प्रकाश डालते हुए किसानों को जागरूक किया।

गृह विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. रश्मि दुर्गापाल ने दैनिक जीवन में फल एवं सब्जियों के महत्व को समझाया। उन्होंने विशेष रूप से बाजरा के मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) के बारे में जानकारी दी, जिससे किसान अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकें।

पशुपालन और थनेला रोग प्रबंधन

पशुपालन विशेषज्ञ जगपाल जोगी ने पशुपालकों को गायों में होने वाले थनेला रोग के लक्षण और उसके प्रबंधन के उपाय सुझाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्वच्छ दुग्ध दोहन के सही तरीकों के बारे में भी विस्तार से बताया।

नेहरू नव युवक मंडल, रोहिड़ी के समाजसेवी इमदाद खान नोहड़ी ने सबल नारी परियोजना और विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान धीरज शर्मा, अजीज खान मीनाणी, अध्यापक मिरखा राम और प्रेरक कुमारी हिना ने भी संदर्भ सेवाएं प्रदान कीं।

किसान करें पोषक तत्व का संतुलित उपयोग

कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर और बीएलएमसीएल की एकीकृत ग्रामीण आजीविका परियोजना के अंतर्गत शुक्रवार को लूनू, बोला, गेहूं पंचायतों में मृदा एवं जल परीक्षण मोबाइल लैब के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करने, फसल उत्पादन को बढ़ाने के लिए जैविक, रासायनिक उर्वरकों के सही संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक करना था।

कार्यक्रम के तहत, किसानों के खेतों से मिट्टी और पानी के नमूने एकत्र मौके पर ही परीक्षण किया, जिससे किसानों को तुरंत अपनी मिट्टी की स्थिति की जानकारी मिली। डॉ. गीतेश मिश्र ने इस अवसर पर बताया कि उर्वरकों का संतुलित एक्सपेरिमेंट न केवल खेती की लागत को कम करता है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य को भी दीर्घकालिक रूप से बेहतर बनाता है।

फसल बीमा योजना से बाहर अनार खेती

कभी पारंपरिक खेती में सीमित आमदनी से जूझने वाले बाड़मेर-बालोतरा जिले के किसानों के लिए अनार बागवानी समृद्धि का माध्यम बनी, लेकिन अब यही महंगी खेती फसल खराब होने पर किसानों की कमर तोड़ रही है। हजारों किसान वर्षों से अनार फसल को बीमा योजना में शामिल करने की मांग कर रहे हैं, ताकि प्राकृतिक आपदा और रोग से नुकसान होने पर उन्हें आर्थिक संबल मिल सके।

वर्षों से बीमा योजना में शामिल करने की मांग

क्षेत्र में वर्ष 2010 के आसपास गुजरात भ्रमण से प्रेरित होकर किसानों ने अनार बागवानी शुरू की थी। किसानों की मेहनत रंग लाई और बाड़मेर-बालोतरा जिले में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में अनार के करोड़ों पौधे लगाए गए। आज करीब 20 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अनार की खेती हो रही है और यह क्षेत्र प्रदेश में अनार उत्पादन के लिए पहचान बना चुका है।

किसानों का कहना है कि अनार बागवानी प्रदेश में बड़े स्तर पर होने के बावजूद इसे फसल बीमा योजना में शामिल नहीं किया गया है। इससे नुकसान होने पर किसानों को किसी प्रकार की राहत नहीं मिलती। किसानों ने सरकार से मांग की है कि अनार खेती को भी बीमा योजना में शामिल किया जाए, ताकि संकट के समय आर्थिक सहायता मिल सके।