विश्व थैलेसीमिया दिवस विशेष: एमबी हॉस्पिटल में रोज 15 से 20 बच्चों को चढ़ रहा खून
उदयपुर. बचपन खेल और सपनों से जुड़ा होता है, वहीं शहर और आसपास के कई बच्चों का जीवन अस्पताल, सुइयों और ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बीच बीत रहा है। थैलेसीमिया से पीड़ित इन बच्चों को हर 10 से 15 दिन में शरीर का पूरा खून फिर से चढ़वाना पड़ता है। धीमी और पीड़ादायक प्रक्रिया से गुजरना जैसे इनकी जिंदगी का अभिन्न अंग बन गया हो। विश्व थैलेसीमिया दिवस पर एमबी हॉस्पिटल के आंकड़े बीमारी की गंभीरता को दिखाते हैं। अस्पताल के थैलेसीमिया वार्ड में वर्तमान में 889 मरीज पंजीकृत हैं, जहां प्रतिदिन 15 से 20 बच्चों का ब्लड ट्रांसफ्यूज किया जा रहा है। 2025 में यहां 4615 ब्लड ट्रांसफ्यूजन किए गए।—-
तीन महीनों में 1141 मरीज पहुंचे
एमबी हॉस्पिटल के रिकॉर्ड के अनुसार फरवरी, मार्च और अप्रैल 2026 में कुल 1141 मरीज थैलेसीमिया/हिमोफिलिया वार्ड पहुंचे। इनमें फरवरी में 381, मार्च में 388 और अप्रैल में 372 मरीज शामिल रहे। इसी अवधि में कुल 839 सिंगल ब्लड ट्रांसफ्यूजन किए गए। फरवरी में 282, मार्च में 314 और अप्रैल में 288 बच्चों को सिंगल ट्रांसफ्यूजन देना पड़ा। वहीं डबल ब्लड ट्रांसफ्यूजन के भी 257 मामले सामने आए। फरवरी में 99, मार्च में 74 और अप्रैल में 84 बच्चों को दो बार ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ी।
आम बच्चों जैसा जीवन इनके लिए सपना
थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए अस्पताल जाना अब जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कई परिवार डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सलूंबर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बच्चों को लेकर उदयपुर पहुंचते हैं। सुबह जल्दी निकलकर पूरा दिन अस्पताल में बिताने के बाद शाम को वापस घर लौटना पड़ता है। इस कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। कई बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा पाते। खेलकूद और दोस्तों के साथ समय बिताने की उम्र में उनका अधिकांश समय अस्पतालों में गुजरता है। कई बार बार-बार सुई लगने और लगातार उपचार की प्रक्रिया के कारण बच्चे मानसिक रूप से भी परेशान हो जाते हैं।—
दर्द के बीच भी नहीं टूट रहा हौसला
एमबी हॉस्पिटल के थैलेसीमिया वार्ड में कई बच्चे ऐसे भी हैं जो दर्द और परेशानी के बावजूद मुस्कुराते नजर आते हैं। कोई मोबाइल पर गेम खेलता दिखता है तो कोई किताब पढ़ता रहता है। कुछ बच्चे डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ से घुल-मिल चुके हैं और अस्पताल को ही अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानने लगे हैं।
सरकारी सहायता से इलाज का सहारा
विशेषज्ञों के अनुसार थैलेसीमिया का स्थायी इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट है, जिसका खर्च लाखों रुपए तक पहुंचता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह इलाज कराना आसान नहीं होता। हालांकि सरकारी योजनाओं और सहायता के जरिए कई मरीजों को इलाज में राहत मिल रही है। अधिकतर मरीज नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और दवाइयों के सहारे जीवन जी रहे हैं। बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन बढ़ने का खतरा रहता है, इसके लिए लंबे समय तक महंगी दवाइयां लेनी पड़ती हैं।
जागरूकता और रक्तदान जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार विवाह से पहले और गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया जांच बेहद जरूरी है। यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर होते हैं तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा बढ़ जाता है। समय पर जांच और जागरूकता से इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
हम सलूंबर से हर 15-20 दिन में बेटे को लेकर उदयपुर आते हैं। सुबह जल्दी निकलते हैं और शाम तक अस्पताल में ही समय गुजर जाता है। कई बार काम भी छूट जाता है, लेकिन बच्चे की तबीयत ठीक रहे इसलिए सब सहना पड़ता है। अब अस्पताल आना हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया है।
सरोज, थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे की मां
बेटी को बचपन से ही नियमित खून चढ़ाना पड़ रहा है। इलाज और दवाइयों का खर्च उठाना आसान नहीं है, लेकिन हम हार नहीं मानते। स्कूल की पढ़ाई भी प्रभावित होती है, फिर भी वह हमेशा मुस्कुराती रहती है। उसका हौसला ही हमें मजबूत बनाए रखता है।
मुकेश गुप्ता, थैलेसीमिया पीड़ित बच्ची के पिता
थैलेसीमिया बच्चों को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और निरंतर देखभाल की जरूरत होती है। एमबी हॉस्पिटल में मरीजों को बेहतर उपचार और समय पर रक्त उपलब्ध है।
डॉ. आरएल सुमन, अधीक्षक एमबी हॉस्पिटल