संपादकीय: किसकी नैया पार लगाएगा चुनावों में रेकॉर्ड मतदान

पहले असम, केरल और पुड्डचेरी में रेकॉर्ड मतदान…और अब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी मतदाताओं ने पिछले रेकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। पश्चिम बंगाल में छिटपुट हिंसक वारदातों को छोड़ दिया जाए तो दोनों राज्यों में मतदान का शांतिपूर्ण रहना यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हम वाकई दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं। फिर भी चुनाव आयोग की पैनी नजर और सुरक्षा बलों की तत्परता के बावजूद एक भाजपा प्रत्याशी से मारपीट और एक अन्य भाजपा प्रत्याशी की कार पर हमला होना दुखद है। एकाध स्थानों पर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प पश्चिम बंगाल के राजनीतिक मिजाज को दर्शाता है। दूसरी तरफ तमिलनाडु में एक ही चरण में होने वाला शांतिपूर्ण मतदान सुकून देने वाला है।

दोनों राज्यों में रेकॉर्ड मतदान किसके पक्ष में रहेगा यह तो चार मई को होने वाली मतगणना से ही पता लगेेगा इतना तय है कि नतीजे जो भी आएंगे वे देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले होंगे। पश्चिम बंगाल में मतदान ने इस बार वाकई चौंकाया है। इससे पहले छह-सात चरणों में होने वाला मतदान इस बार दो चरणों में पूरा हो रहा है। पहले आशंका व्यक्त की जा रही थी कि क्या वहां सिर्फ दो चरणों में मतदान कराना संभव है? मतदाताओं को तो शांतिपूर्वक मतदान के लिए धन्यवाद है ही, चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों की भूमिका भी इसमें अधिक रही है। जिस प्रदेश में सात चरणों के मतदान के बावजूद हिंसा में १५-२० जनों की मौत सामान्य मानी जाती थी, वहां सब-कुछ सामान्य रहना लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत ही माना जाएगा। आज के मतदान के साथ ही पांच में से चार राज्यों में मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। पांच दिन बाद पश्चिम बंगाल की बची १४२ सीटों पर भी मतदान हो जाएगा। महीने भर प्रचार अभियान के दौरान राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के बीच आरोप-प्रत्यारोपों के तीर चले, गरमागरमी भी हुई, पर ये शायद भारत के राजनीतिक परिवेश में सामान्य है। आजादी के बाद के चुनावों में हमारा लोकतंत्र साल-दर-साल परिपक्व ही हुआ है। फिर भी हमारी चुनावी व्यवस्था में अभी काफी सुधार की गुंजाइश है। ‘एक देश एक चुनाव’ चुनावी खर्चों पर अंकुश और राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वालों के प्रवेश पर रोक जैसे विषयों पर सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनाकर इसे अमलीजामा पहनाने की जरूरत है।

राजनीति में बढ़ता टकराव भी हमारे लोकतंत्र पर कभी-कभी सवालिया निशान खड़े करता है। चुनावों में कौन जीतता है और कौन पराजित होता है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न लोकतंत्र की मजबूती का है। दुनिया के अनेक देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां सत्ता पाने के लिए हिंसा का सहारा लेने की नौबत आती रही है। लेकिन हमारा लोकतंत्र पहले बैलेट से और अब ईवीएम के जरिये परिपक्व हो रहा है। ये गर्व की बात है।