डॉ. यतीन्द्रसिंह सिसोदिया, लेखक मध्यप्रदेश सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान, उज्जैन के निदेशक हैं– लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में पंचायती राज ही वह माध्यम है, जो शासन को सामान्यजन के द्वार तक लाता है। स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्रीय विकेंद्रीकरण की दिशा में हुए प्रयासों में 24 अप्रेल 1993 को पारित 73वां संविधान संशोधन अधिनियम सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं गंभीर प्रयास रहा है। इस संशोधन अधिनियम से जहां एक ओर इन संस्थाओं को वैधानिक दर्जा मिला वहीं दूसरी तरफ ऐसे समुचित उपबंध किए गए, जिससे कि पंचायतें स्वशासन की स्वतंत्र इकाइयां बनकर सरकार के तीसरे स्तर के रूप में कार्य कर सकें। इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को तीन दशक से अधिक का समय हो चुका है। पंचायतों में छठी पीढ़ी का कार्यकाल चल रहा है। समाज के सभी वर्गों की वृहद राजनीतिक भर्ती इस सम्पूर्ण व्यवस्था से संभव हुई। राज्यों ने पंचायत कानून में कई बदलाव कर व्यवस्था को ज्यादा तर्कसंगत और कार्यान्वयन की दृष्टि से अनुकूल बनाने का प्रयास किया है।
जन-केंद्रित शासन प्रदान करने के लिए पंचायती राज संस्थाएं सबसे बेहतर विकल्प हैं, लेकिन अधिकांश राज्यों में यह अनुभव रहा है कि पंचायतें केंद्र एवं राज्य सरकारों की एक कार्यान्वयन एजेंसी (अनुक्रम विभाग) की तरह कार्य करती है। राज्यों में स्थानीय स्तर पर नौकरशाही की अतिरिक्त प्रभावशाली स्थिति निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका को गौण करते हैं। पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत स्थानों का आरक्षण होने के बावजूद अधिकांश राज्यों में पंचायतों में ‘प्रॉक्सी नेतृत्व’ की उपस्थिति चिंतनीय पहलू है। प्रभावशाली विकेंद्रीकृत अभिशासन के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय लोगों की जरूरतों, इच्छाओं, पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक मूल्यों के साथ अच्छी तरह से संयोजन करते हुए निर्वाचित जनप्रतिनिधि ईमानदारी, योग्यता और लोक सेवा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। अभिशासन को लोकतांत्रिक, सबको साथ लेकर चलने वाला, पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए।
जमीनी स्तर पर राजनीतिक गत्यात्मकता जटिल हैं, जिनमें कई हितधारक सम्मिलित होते हैं, जिनका अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग प्रभाव होता है। वास्तविकता में, यह तर्क दिया जा सकता है कि स्पष्ट नियमों के बावजूद, वृहद स्तर पर लिए गए निर्णयों और जमीनी वास्तविकता के बीच एक अंतर बना हुआ है। प्रभावशाली ग्रामीण विकास पाने के लिए पंचायतों के कामकाज के बारे में स्थानीय अधिकारियों और स्थानीय नेतृत्व के बीच जागरूकता और संवेदनशीलता की बहुत आवश्यकता है। आज पंचायतों को विकास के सभी मुद्दों पर प्रत्यक्ष भागीदारी सौंपने के प्रावधान किए जा रहे हैं, लेकिन प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण के प्रयास उतने सटीक एवं कारगर दिखाई नहीं देते जितने इस व्यवस्था के संदर्भ में आवश्यक हैं। जब तक राज्य शासन के स्तर पर प्रशिक्षण की आवश्यकता का बेहतर मूल्यांकन नहीं होगा एवं तद्नुरूप प्रशिक्षण सामग्री का निर्माण करके प्रतिबद्ध लोगों को ऐसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी, पंचायत प्रतिनिधि जानकारी के अभाव में आगे नहीं आ पाएंगे।
विकसित भारत के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के सभी वर्गों का सामाजिक विकास के मानकों में उल्लेखनीय प्रगति करना आवश्यक पूर्वशर्त है, जिसको प्राप्त करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण और इनकी भूमिका को ज्यादा कारगर, अर्थपूर्ण एवं जवाबदेह बनाने से अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने की संभावना बढ़ेगी। पंचायतों को नए संकल्प, नई प्रेरणा एवं नई ऊर्जा के साथ आगे आकर काम करने के लिए प्रेरित करना होगा।