मिलिंद कुमार शर्मा, (एम.बी.एम. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) सह लेखक, खुशबू शाह व ललित ज्याणी(नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कार्यरत)– हाल के वर्षों में मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर किया है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा करता हैं, ऐसी परिस्थितियां केवल अंतरराष्ट्रीय घटनाएं नहीं, बल्कि सीधे आर्थिक दबाव का कारण बन सकती हैं। इसका प्रभाव महंगाई में वृद्धि, राजकोषीय असंतुलन तथा चालू खाते के घाटे के रूप में स्पष्ट दिखाई देगा। नीति आयोग के अनुसार, आने वाले दशकों में भारत की ऊर्जा मांग विश्व में सबसे तेज गति से बढऩे वाली है। यदि ऊर्जा स्रोतों का समय रहते विविधीकरण नहीं किया गया, तो वैश्विक आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
इसी संदर्भ में इथेनॉल मिश्रण एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है, जो पेट्रोल के साथ मिलाकर उपयोग किया जाने वाला एक जैव-ईंधन है और मुख्यत: गन्ना, मक्का तथा अन्य कृषि उत्पादों या उनके अवशेषों से तैयार किया जाता है, जिससे ईंधन की कुल लागत को नियंत्रित करने और कीमतों को अपेक्षाकृत कम रखने में सहायता मिलती है। पिछले एक दशक में यह पहल एक सीमित प्रयोग से आगे बढ़कर देश की ऊर्जा नीति का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। वर्ष 2013 में जहां इथेनॉल मिश्रण का स्तर मात्र 1.5 प्रतिशत था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकार ने 2025-26 तक इसे 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस पहल से न केवल देश को प्रतिवर्ष लगभग 30,000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत होने की संभावना है, बल्कि लगभग 10 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्राजील और अमरीका जैसे देशों के अनुभव इस दिशा में मार्गदर्शक बन सकते हैं। ब्राजील में इथेनॉल मिश्रण लगभग 27 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और वहां बड़ी संख्या में ऐसे वाहन उपलब्ध हैं, जो पूर्णत: इथेनॉल पर संचालित हो सकते हैं। वहीं अमरीका में सामान्यत: 10 प्रतिशत मिश्रण प्रचलित है, परंतु उच्च स्तर के मिश्रणों का भी व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सफल क्रियान्वयन के लिए केवल नीति निर्माण ही नहीं, बल्कि मजबूत आपूर्ति शृंखला, तकनीकी अनुकूलन और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता भी आवश्यक होती है। भारत के लिए इथेनॉल मिश्रण का महत्व विशेष रूप से तब बढ़ जाता है जब वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित होती है। ऐसे समय में पेट्रोल के स्थान पर आंशिक रूप से घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का उपयोग कर देश अपनी निर्भरता को कम कर सकता है। हालांकि, इस दिशा में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। गन्ना जैसी जल-गहन फसलों पर अत्यधिक निर्भरता जल संकट वाले क्षेत्रों में चिंता का विषय बन सकती है। इसीलिए अब नीति स्तर पर मक्का, क्षतिग्रस्त अनाज तथा कृषि अवशेषों से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल जल संसाधनों पर दबाव कम होगा, बल्कि पराली जलाने जैसी पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में भी मदद मिलेगी। इथेनॉल मिश्रण को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचे का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत भंडारण, परिवहन और वितरण प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना होगा। साथ ही, ऑटोमोबाइल उद्योग को भी ऐसे वाहनों के विकास पर ध्यान देना होगा जो उच्च स्तर के इथेनॉल मिश्रण पर कुशलतापूर्वक संचालित हो सकें। इस दिशा में सरकार, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र के बीच समन्वय आवश्यक है। आने वाले समय में भारत की ऊर्जा रणनीति को संतुलित और दूरदर्शी होना होगा। इथेनॉल मिश्रण को आगे बढ़ाते हुए पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम कर, कृषि अवशेषों और उन्नत जैव ईंधनों की दिशा में कदम बढ़ाना आवश्यक है। साथ ही, विद्युत वाहनों के लिए आवश्यक खनिज संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता को भी ध्यान में रखना होगा।
ऐसे परिदृश्य में इथेनॉल मिश्रण एक पूरक समाधान के रूप में उभरता है, जो न केवल तेल आयात पर निर्भरता घटाता है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को भी सुदृढ़ करता है। यदि भारत इस दिशा में संतुलित नीति, मजबूत आधारभूत संरचना और तकनीकी नवाचार के साथ आगे बढ़ता है, तो वह एक आत्मनिर्भर, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा भविष्य की ओर निर्णायक कदम रख सकता है।