कागजों में उठ रहा है मोबाइल वेटेरीनरी यूनिट का भुगतान

नागौर. प्रदेश में संचालित हो रही 536 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) पर हर महीने करीब 9.48 करोड़ रुपए लुटाए जा रहे हैं। जबकि धरातल पर पशुपालकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। जिला स्तरीय अधिकारियों की मिलीभगत से हर महीने बिल बनाकर विभाग को पेश कर दिए जाते है। अनुबंधित फर्म बिना पशुओं का उपचार किए भुगतान उठा रही है।
एमवीयू को लेकर विधानसभा में भी विधायकों की ओर से सवाल पूछे गए, लेकिन इनके जवाब में भी स्पष्टता नहीं हैं। मकराना विधायक जाकिर हुसैन गैसावत ने तारांकित सवाल के माध्यम से थोड़ी गहराई में जानकारी मांगी तो छह माह बाद भी जवाब उन्हें नहीं मिला है। इस योजना की वास्तविकता और लग रहे आरोपों की पड़ताल करने के लिए सोमवार को राजस्थान पत्रिका ने स्टिंग किया। इसमें चौंकाने वाली स्थिति सामने आई।

वैन नहीं पहुंची तो बिना चिकित्सक युवक पहुंचे
पत्रिका ने तीन अलग-अलग गांवों से पशुपालकों से हेल्पलाइन नम्बर 1962 पर कॉल करवाई। इनमें दो जगह वैन पहुंची नहीं। एक जगह बिना पशु चिकित्सक के तीन युवक पहुंच गए। इनके पास भी पर्याप्त दवाइयां तक नहीं थी। एक टेबलेट दी, वो भी पुरानी और रेपर फटे हुए थी। दूसरी तरफ पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक के यहां वैन की हाजिरी का पता करने पर सोमवार को सभी 13 वैन में चिकित्सकों की उपस्थित दर्ज है। उधर, खजवाना पहुंची वैन के युवकों ने बताया कि डॉक्टर छुट्टी पर है। गांव बू-नरावता में वैन पहुंची ही नहीं।

हकीकत: 1962 सुविधा खुद ही बीमार
खजवाना के पशुपालक सुरेश जाखड़ ने बीमार भैंस के इलाज के लिए सोमवार दोपहर 1.50 बजे एमवीयू के लिए हेल्पलाइन नम्बर 1962 पर फोन किया। दोपहर 3 बजे कोई भी वैन नहीं पहुंची। इस पर फिर कॉल किया तो शाम 5 बजे मोबाइल वैन पहुंची। परन्तु वैन में कोई पशु चिकित्सक नहीं था। तीन युवक थे, जिन्होंने खुद को वेटेनरी छात्र बताया। पशुपालक ने दवाओं के बारे में पूछा तो कहा कि वे इमरजेंसी सेवा वाले हैं, उनके पास ज्यादा दवाइयां नहीं है। एक टेबलेट दी, जिसकी पैकिंग खुली हुई थी। दवा की जानकारी का प्रिंट भी घिसा हुआ था।

मिला जवाब: आज नहीं आ सकते
गांव इंदास के पशुपालक प्रकाश पूनिया ने दोपहर सवा 3 बजे गाय के इलाज के लिए 1962 पर फोन किया। महिला कर्मचारी ने पशु के बारे में जानकारी मांगी तथा थोड़ी देर इंतजार करने के लिए कहा। इसके बाद एमवीयू से एक युवक ने फोन किया। दुबारा पशु के बारे में जानकारी ली और कहा कि आज नहीं आ सकते। मंगलवार को दुबारा फोन करना।

न फोटो, न वीडियो, न ही जीओ टैग
एमवीयू के फर्जीवाड़े में खास बात यह है कि जिस पशु का उपचार किया जाता है, उसकी न तो फोटो ली जाती है और न ही वीडियो बनाया जाता है। न ही जीओ टैगिंग होती है। ऐसे में यदि कोई यह साबित नहीं कर सकता कि वैन मौके पर गई या नहीं। पशुपालक थक-हारकर गांवों में काम करने वाले कंपाउंडरों से उपचार करवा लेते हैं।

1.77 लाख में दवा व चिकित्सा शामिल
नागौर जिले में कुल 13 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाई संचालित हैं। एक यूनिट के बदले प्रति माह 1.77 लाख का भुगतान अनुबंधित फर्म को किया जाता है। इसके तहत फर्म को चिकित्सक, वैन के चालक, दवाइयां आदि की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होती है। यदि किसी दिन डॉक्टर या चालक अनुपस्थित रहता है तो उस दिन का भुगतान काट लिया जाता है। सोमवार को हाजरी के समय सभी वैन में चिकित्सकों उपिस्थत थे।

डॉ. महेश मीणा, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग, नागौर