राजस्थान-गुजरात ‘बाल श्रम’ नेटवर्क ध्वस्त, सूरत की फैक्ट्रियों से आजाद हुए उदयपुर के 91 मासूम 

राजस्थान के आदिवासी इलाकों से बच्चों को बहला-फुसलाकर गुजरात के कारखानों में झोंकने वाले एक बहुत बड़े गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। सूरत की सीताराम और मुक्तिधाम सोसाइटी में जब बुधवार को राजस्थान पुलिस, गुजरात पुलिस और नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट (एनसीपीसीआर) की टीमों ने एक साथ छापेमारी की, तो अंदर का मंजर देखकर अनुभवी अधिकारियों की रूह भी कांप उठी। छोटे-छोटे बच्चों से साड़ियों के तीखे धागे कटवाए जा रहे थे और कटर जैसी खतरनाक मशीनें चलवाई जा रही थीं, जिससे उनकी जान को हमेशा खतरा बना रहता था।

कांप रहा था 7 साल का मासूम, मशीनों के शोर में दबी थीं चीखें

सूरत की तंग गलियों में बनी कपड़ा और पैकेजिंग यूनिटों में रेड के दौरान दिल को झकझोर देने वाले दृश्य सामने आए। फैक्ट्रियों के संकरे और अंधेरे कमरों में जब जांच टीम दाखिल हुई, तो वहां मौजूद सबसे छोटा बच्चा, जिसकी उम्र महज सात साल थी, वह बिना शर्ट के डर से कांप रहा था। वह पुलिस को देखकर रोने लगा और खुद को दूसरे बड़े बच्चों के पीछे छिपाने की कोशिश करने लगा।

NCPCR rescues 91 children from child labor in Surat.https://t.co/WZMsADwhTThttps://t.co/nxzvxnvPkS pic.twitter.com/UUBNE9dk0t

— NCPCR (@NCPCR_) May 14, 2026

मुक्त कराए गए बच्चों में उदयपुर के कोटड़ा, झाड़ोल और खेरवाड़ा जैसे आदिवासी क्षेत्रों के बच्चे सबसे ज्यादा हैं। इनमें 8 और 10 साल के दो सगे भाई भी शामिल हैं, जिन्हें उनके माता-पिता से बेहतर जिंदगी का झांसा देकर छीना गया था। राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के मासूम भी इस दलदल में फंसे मिले।

12-12 घंटे की जानलेवा शिफ्ट

इन मासूमों की पूरी दुनिया मशीनों के कान फोड़ देने वाले शोर, साड़ियों के केमिकल और जहरीले धुएं के बीच सिमट कर रह गई थी। प्राथमिक जांच में सामने आया कि इन बच्चों से बिना किसी छुट्टी के हर दिन 12 से 14 घंटे तक लगातार काम लिया जा रहा था।

कई बच्चे तो पिछले तीन-चार साल से अपने माता-पिता की शक्ल तक नहीं देख पाए थे। उन्हें सिर्फ ‘सूरत शहर घुमाने’ का लालच देकर लाया गया था और यहाँ लाते ही बंधक बना लिया गया।

27 फैक्ट्री मालिकों पर केस दर्ज

91 Child Labourers Rescued BY Gujarat Rajasthan Police

इस पूरे ऑपरेशन की नींव ‘गायत्री सेवा संस्थान’ की एक गुप्त और सटीक सूचना पर रखी गई थी। इसके बाद राजस्थान और गुजरात पुलिस के 22 आला अधिकारियों की स्पेशल टीम ने जाल बिछाया।

पुणागाम थाना पुलिस ने क्षेत्र की उन 27 टेक्सटाइल और पैकेजिंग यूनिटों के संचालकों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज की है, जहां ये बच्चे गुलामी कर रहे थे।

छापेमारी के दौरान यूनिट संचालकों ने दलील दी कि वे बच्चों को उनके माता-पिता की मर्जी और एडवांस पैसे देकर लाए हैं। हालांकि, पुलिस और NCPCR ने दो टूक कहा कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों से इस तरह का जानलेवा काम करवाना पूरी तरह गैर-जमानती अपराध है।

श्रम माफिया का ‘सॉफ्ट टारगेट’

સુરત:પુણા વિસ્તારમાં આવેલ અલગ અલગ સાડીના કારખાનાઓમાં બાળમજૂરી કરતા 84 જેટલા બાળકોને બાળમજૂરીમાંથી મુક્ત કરાવતી સુરત શહેર પુણા પોલીસ.@CMOGuj @sanghaviharsh @dgpgujarat @GujaratPolice#સુરત_શહેર_પોલીસ_તમારી_સાથે_તમારા_માટે#Suratpolice #gujaratpolice #suratcitypolice #punapolice pic.twitter.com/BMI4WADVG5

— Surat City Police (@CP_SuratCity) May 13, 2026

जांच में यह कड़वा और सामाजिक सच भी सामने आया है कि राजस्थान के आदिवासी अंचलों में फैली भीषण गरीबी और स्कूलों से बढ़ता ड्रॉपआउट रेट (पढ़ाई छोड़ना) इन बच्चों के लिए अभिशाप बन गया है।

बाल श्रम माफिया के लोकल एजेंट गांवों में घूमते हैं। वे गरीब और अनपढ़ परिवारों को निशाना बनाते हैं और उन्हें कुछ हजार रुपयों का लालच देकर उनके बच्चों को ‘अच्छी नौकरी और पढ़ाई’ का झूठा वादा करके ले जाते हैं।

बाल अधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि सूरत के सिर्फ बड़े उद्योगों में ही नहीं, बल्कि चाय की थड़ियों, ढाबों और घरेलू कामों में भी राजस्थान के हजारों आदिवासी बच्चे खप रहे हैं, जिनके रेस्क्यू के लिए एक बड़े सर्च ऑपरेशन की जरूरत है।

अभी सिर्फ केस, गिरफ्तारियां बाकी

फिलहाल रेस्क्यू किए गए सभी 91 बच्चों को सुरक्षित बाल सुधार गृहों और शेल्टर होम्स में भेजकर उनके पुनर्वास और काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुणागाम थाना प्रभारी वी.एम. देसाई ने बताया, “मामला अत्यंत गंभीर है और हमने सख्त धाराओं में केस दर्ज कर लिया है। बच्चों को राजस्थान और अन्य राज्यों के गांवों से बहला-फुसलाकर सूरत लाने वाले उन मुख्य एजेंटों और दलालों की लिस्ट बनाई जा रही है। जल्द ही इस पूरे नेटवर्क से जुड़े आरोपियों की गिरफ्तारियां की जाएंगी।”