सिरोही। सांसारिक आकर्षणों और भौतिक सुखों की होड़ के बीच जब कोई कम उम्र में ही वैराग्य का मार्ग चुनता है, तो वह समाज के लिए एक गहरी आध्यात्मिक प्रेरणा बन जाती है। ऐसा ही प्रेरक उदाहरण सिरोही जिले के झाड़ोली गांव में देखने को मिला, जहां गिरीश जैन की पुत्री सेलसी कुमारी ने मात्र 17 वर्ष की उम्र में संसार के मोह-माया का त्याग कर संयम और साधना का मार्ग अपनाया।
स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद सेलसी ने भौतिक उपलब्धियों से ऊपर उठकर आत्मिक शांति की खोज को जीवन का लक्ष्य बनाया। उन्होंने 13 मई को मुंबई में आचार्य भगवंत कीर्तिसूरीजी महाराज के सान्निध्य में विधिवत दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद उन्हें नया नाम ‘साध्वी प्रभा’ दिया गया, जो उनके जीवन में प्रकाश और ज्ञान के नए अध्याय का प्रतीक माना जा रहा है।
दीक्षा लेने पहले सांसारिक वस्तुओं का दान
दीक्षा से पूर्व साध्वी प्रभा ने अपने पैतृक गांव झाड़ोली की हर गली में जाकर घर-घर भौतिक वस्तुओं का दान किया। यह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं था, बल्कि सांसारिक मोह से पूर्ण रूप से मुक्ति की घोषणा थी। उन्होंने लोगों को सेवा, अहिंसा और परोपकार का संदेश देते हुए कहा कि यदि हर कार्य निस्वार्थ भाव से किया जाए, तो जीवन स्वयं ईश्वर की भक्ति बन जाता है।
भावुक माहौल में दी गई विदाई
गांव में उनकी विदाई के समय भावुक माहौल देखने को मिला। परिजन, ग्रामीण और परिचित उनकी इस कठोर लेकिन आध्यात्मिक यात्रा को देखकर भाव-विभोर हो उठे। कई लोगों के लिए यह क्षण समझ से परे था, लेकिन अधिकतर ने इसे एक दुर्लभ आध्यात्मिक जागृति के रूप में स्वीकार किया।
आचार्य कीर्तिसूरीजी महाराज ने क्या कहा?
दीक्षा समारोह में आचार्य भगवंत कीर्तिसूरीजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति, संयम और आत्म-त्याग से ही संभव है। उन्होंने बताया कि संसार के आकर्षणों से ऊपर उठकर जब कोई आत्मा भगवान की शरण में जाती है, तभी सच्चे मोक्ष का मार्ग खुलता है। साध्वी प्रभा का यह निर्णय उसी आध्यात्मिक उत्कर्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जीवन परिवर्तन का संदेश
मुंबई में आयोजित इस दीक्षा कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। वातावरण भक्ति, संगीत और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर था। साध्वी प्रभा के त्याग और समर्पण को देखकर उपस्थित लोग श्रद्धा और भावनाओं से अभिभूत हो गए। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत जीवन परिवर्तन है, बल्कि समाज के लिए यह संदेश भी है कि सच्ची शांति और स्थायी सुख बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर ही खोजा जा सकता है।