जिस सरकारी स्कूल में बालिकाओं के लिए शौचालय तक उपलब्ध नहीं हो और पर्दे लगाकर सड़क किनारे वैकल्पिक इंतजाम किया गया हो, वहां शिक्षा का वातावरण कितना सम्मानजनक और सुरक्षित होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। राजस्थान में कोटा जिले के गुंदी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय की तस्वीर केवल एक गांव या एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के सरकारी शिक्षा तंत्र की उस सच्चाई को सामने लाती है, जिसे हम विकास के चमकदार नारों के बीच कई बार नजरअंदाज कर देते हैं। स्कूल में शौचालय नहीं होना न केवल असुविधा से जुड़ा है बल्कि बालिकाओं की गरिमा और उनके शिक्षा के अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
दुनिया में शिक्षा प्रणाली को विकास की नींव माना जाता है। सरकारें नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास और तकनीकी संसाधनों की बातें करती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज भी देशभर के सैकड़ों सरकारी स्कूल मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कहीं शौचालय नहीं हैं, कहीं पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, कहीं बिजली नहीं पहुंची है और कहीं बच्चे जर्जर भवनों में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ऐसे हालात में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बातें अधूरी लगती हैं। विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा के लिए शौचालय जैसी सुविधा अत्यंत आवश्यक है। शोध यह बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं के स्कूल छोडऩे का एक बड़ा कारण सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की कमी है। किशोरावस्था में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। जब विद्यालय में बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी तो अभिभावक भी बेटियों को नियमित रूप से स्कूल भेजने में संकोच करेंगे। ऐसे में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान तभी सार्थक होंगे, जब स्कूलों में सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित किया जाए। विडंबना यह है कि सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले अधिकांश बच्चे गरीब, ग्रामीण और मजदूर परिवारों से आते हैं। यही बच्चे आगे चलकर डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, सैनिक और प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश का भविष्य गढ़ते हैं। इसलिए सरकारी स्कूल केवल शिक्षा संस्थान नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और अवसरों के केंद्र हैं। यदि इन स्कूलों की उपेक्षा होगी तो इसका असर सीधे देश के भविष्य पर पड़ेगा।
अब बारिश का मौसम भी आने वाला है। कई स्कूलों की छतें टपकती हैं, परिसर में पानी भर जाता है और जर्जर भवनों के कारण दुर्घटना का खतरा बना रहता है। केवल निरीक्षण और घोषणाओं तक सीमित नहीं रह कर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। विकास केवल ऊंची इमारतों, एक्सप्रेस-वे और डिजिटल योजनाओं से नहीं मापा जाता। असली विकास तब माना जाएगा, जब गांव के एक छोटे से सरकारी स्कूल की बालिका भी सम्मान, सुरक्षा और सुविधा के साथ शिक्षा प्राप्त कर सके।