Rajasthan, Bhilwara ; शिक्षा के ‘भीलवाड़ा मॉडल’ ने प्रदेश को राह दिखाई, शिक्षा मंत्री के गृह जिले की स्थिति चिंताजनक

प्रदेश में शिक्षा के अधिकार को धरातल पर उतारने की मुहिम में भीलवाड़ा जिला सिरमौर बनकर उभरा है। राज्य सरकार की ओर से 7 मई को जारी आंकड़ों के अनुसार आउट ऑफ स्कूल बच्चों को स्कूलों की मुख्यधारा से जोड़ने के मामले में भीलवाड़ा ने पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का गृह जिला कोटा इस सूची में पिछड़कर 37वें पायदान पर पहुंच गया है। यह आंकड़े 41 जिलों के आधार पर जारी किए गए हैं। यह लक्ष्य एक अप्रेल से चलाए गए प्रवेशोत्सव के दौरान हासिल किया गया है।

भीलवाड़ा: 94 प्रतिशत से अधिक लक्ष्य हासिल

जिले में चिन्हित किए गए कुल 15 हजार 608 बच्चों में से 14 हजार 790 बच्चों का स्कूलों में सफल प्रवेश कराया जा चुका है। अब यहां मात्र 5.24 प्रतिशत यानी 818 बच्चे ही शेष रहे हैं, जो प्रदेश में सबसे कम है।

कोटा की स्थिति फिसड्डी

शिक्षा विभाग की इस रिपोर्ट ने विभागीय सक्रियता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा मंत्री के गृह क्षेत्र कोटा में स्थिति विपरीत नजर आ रही है। कोटा जिला इस सूची में 37वें नम्बर पर है, जहां पेंडिंग बच्चों का प्रतिशत 85.38 प्रतिशत है, जो मंत्री के गृह जिले के लिए चिंता का विषय है। वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का भरतपुर जिला प्रदेश में चौथे स्थान पर रहा है।

प्रदेश का रिपोर्ट कार्ड: एक नजर में

राजस्थान में कुल चिन्हित बच्चों के मुकाबले अब तक की प्रगति इस प्रकार है। कुल चिन्हित 3 लाख 77 हजार 800 बच्चे थे। इनमें से 1 लाख 36 हजार 977 यानी 36.26 प्रतिशत बच्चे की मुख्यधारा में आए है। अब प्रदेश में 2 लाख 40 हजार 823 बच्चे ही स्कूल से दूर है। जो 63.74 प्रतिशत है। बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश में अभी भी 63.74 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाने से वंचित हैं। ऐसे में सरकार के हर बच्चा स्कूल के संकल्प को पूरा करने के लिए बाकी जिलों को भीलवाड़ा जैसी कार्ययोजना अपनाने की दरकार है।

जिलेवार स्थिति: टॉप-5 और बॉटम-5

जिला (टॉप-5) पेंडिंग% जिला (बॉटम-5) पेंडिंग%

1. भीलवाड़ा 5.24% 37. कोटा 85.38%

2. बालोतरा 8.16% 38. उदयपुर 85.81%

3. जयपुर 25.38% 39. बारां 86.19%

4. भरतपुर 26.38% 40. प्रतापगढ़ 86.62%

5. टोंक 27.14% 41. धौलपुर 86.67%

पत्रिका व्यू:

आंकड़ों का यह विश्लेषण बताता है कि बजट और योजनाएं समान होने के बावजूद क्रियान्वयन के स्तर पर जिलों में भारी अंतर है। जहां भीलवाड़ा ने अभूतपूर्व सफलता पाई, वहीं धौलपुर और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में 86 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अभी भी ‘नो एक्शन’ मोड में हैं। शिक्षा मंत्री के खुद के जिले का पिछड़ना यह दर्शाता है कि स्थानीय प्रशासन की मॉनिटरिंग के तंत्र में कहीं बड़ी चूक हो रही है।