ब्रह्म निराकार है, ऋत सोम है। ऋत से सृष्टि नहीं होती। मातरिश्वा वायु द्वारा सोम की अग्नि में आहुति दी जाती है। प्रथम सत्य विवर्त अव्यय पुरुष बनता है। ब्रह्म और माया का अद्र्धनारीश्वर रूप ही अव्यय पुरुष है। परात्पर में ब्रह्म और माया भिन्न संस्था में दिखाई पड़ते हैं। दोनों ऋत रूप रहते हैं। माया का कार्य निराकार को साकार करना है। अंधकार होने से माया की गतिविधियां पकड़ में भी नहीं आती। वैसे, अव्यय भी आलम्बन मात्र रहता है। क्रिया तो वहां भी नहीं है। जबकि माया की भूमिका ही ब्रह्म की ‘एकोहं बहुस्याम्’ कामना की पूर्ति करना है। ब्रह्म और माया में न शब्द है, न नाद है और न ही प्रकाश। अत: सारे तत्त्व शब्दशून्य (मौन) धरातल पर ही कार्य करते हैं। ब्रह्म और माया निराकार और गुणातीत अवस्था में है। जहां कोई ज्ञान-अज्ञान, प्रकाश-अंधकार या ध्वनि-मौन का भेद नहीं है।
केनोपनिषद (1.3) श्रुति के अनुसार वहां (उस परमब्रह्म तक) न आंख जाती है, न वाणी जाती है और न ही मन। हम उसे न तो जानते हैं, न ही समझते हैं कि इसका उपदेश कैसे दिया जाए—न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मन:। न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्॥
ब्रह्म और माया के मूल स्वरूप में कोई ध्वनि या वाक् नहीं है। शब्द तो आकाश तत्त्व से उत्पन्न होता है। जो माया की एक अभिव्यक्ति है। ब्रह्म का मौन शब्द शून्यता नहीं बल्कि पूर्णता का मौन है। जबकि माया अपने आप में एक शक्ति है जो स्पन्द और प्रकाश पैदा करती है। उसका मौन केवल क्षणिक निवृत्ति है। ब्रह्म का मौन चैतन्य मौन है। तैत्तिरीय श्रुति इसी चैतन्य मौन को अभिव्यक्त करते हुए कहती है—यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह… अर्थात् जहां से वाणी मन के साथ (उसे न पाकर) लौट आती है। मौन सकारात्मक और नकारात्मक दो दिशा में विचारों के प्रवाह को ले जाता है। यह व्यक्ति की प्रकृति-वातावरण पर निर्भर करता है। मन की भूमिका प्रधान होती है, शरीर शान्त रहता है। शक्ति संचय का अवसर देता है, किन्तु मौन व्यक्ति की शक्ति है, शब्द अभिव्यक्ति है। जहां कोई ग्रहण करने वाला भी है। मौन शब्द का आत्मा है। सूक्ष्म शरीर में ले जाता है। व्यक्ति के विचारों की गति वहां तेज और गहन हो जाती है। बाहर से सम्पर्क कट जाता है।
स्वयं से बात करने का माध्यम है मौन। शब्द शरीर का क्षेत्र है, मौन मन का और शब्दातीत अवस्था आत्मा की मानी जाती है। कारण शरीर आत्मा का धरातल है। वहां भी अंधकार है। सम्पूर्ण सृष्टि मौन से, अंधकार से शुरू होती है। सूर्य रात्रि के अंधकार से निकलता है। जन्म भी मौन है, मृत्यु भी मौन है। मौन माया के क्षेत्र का प्रवेश द्वार है।
शब्द और मौन एक ही केन्द्र से उठते हैं। शब्द की गति बाहर की ओर होती है जबकि भीतर मौन बढ़ता है। विचार भी स्वयं पर गहनता से केन्द्रित होते जाते हैं। शब्दातीत अवस्था है। जैसे अंधकार के गर्भ में ही प्रकाश रहता है। वैसे शब्द के गर्भ में ही मौन रहता है। इसी शक्ति से श्राप और वरदान दिया जाता है। मौन की साधना से ही जीवात्मा का सूत्र ब्रह्म से जुड़ता है।
यही महद् ब्रह्म का क्षेत्र है जिसे कृष्ण अपनी योनि कह रहे हैं—तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्। माया के एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का मार्ग महद् लोक ही है। पंचाग्नि की यात्रा में सूर्य-पर्जन्य-पृथ्वी- शरीर के मह:लोक में ही माया प्रवेश करती है। ब्रह्म माया का केन्द्र होता है—आवरित रहता है। आगे भी ब्रह्म का विवर्त इसी क्रम में आगे बढ़ता है। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया। विश्व की सभी आकृतियां माया निर्मित ही होती है।
मौन ही माया की भाषा है। स्त्री-पुरुष दोनों ही अद्र्धनारीश्वर हैं। दोनों में आधा भाग माया नियंत्रित है। पुरुष भीतर माया है, स्त्री बाहर माया है। जब भी माया कार्यरत होती है, तब मौन छा जाता है, संकेत चलते हैं। एक मौन आत्मा का -परा का- होता है, मन का होता है। दूसरा मौन श्वोवसीयस मन का होता है। मन (जीवात्मा का) ही अव्ययात्मा से जोड़ता है। अन्तर इतना ही है कि पुरुष भीतर से स्त्री तो है, किन्तु अधिकांशत: उसके स्त्रैण भाव का पोषण नहीं हो पाता। उसका पौरुष भाव ही सुदृढ़ होता है। अत: उसका मन शरीर से जुड़ा रहता है। खाना-खेलना ही प्राथमिकता रहती है। आगे चलकर उसका शिक्षण उसे बुद्धिमान भी बनाता है। शरीर और बुद्धि दोनों ही आक्रामकता के तथा अहंकार के पोषक तत्त्व बन जाते हैं। मन से कमजोर भी और संवेदना की अल्पता भी एक पौरुषेय लक्षण रहता है।
कमजोर मन होने से पुरुष भीतर संकल्पवान कम ही हो पाता है। उसके संकल्प पौरुषेय अधिक होते हैं। मन पर स्त्री का साम्राज्य अधिक होता है। स्त्री सौम्या है, मन सौम्य है। दोनों का ही पोषण भी सोमराजा चन्द्रमा से ही होता है। दूसरी ओर वही परा, अपरा प्रकृति है और माया भी। अत: उसका मन ही माया से जुड़कर सृष्टि कामना से ओत-प्रोत रहता है। सृष्टि विस्तार में माया ही प्रेरक तत्त्व बनती है। क्योंकि विस्तार तो एकमात्र ब्रह्म का ही होता है। उसी का दायित्व है। स्त्री की अन्तर्दृष्टि महत्त्वपूर्ण है। स्त्री का संचरण भी भीतर ही अधिक रहता है। वह पति (जीवात्मा) के साथ बंधी रहती है। अत: प्राणमय कोश और अक्षर (परा) के धरातल पर ही जीती है । पुरुष के लिए शरीर ही प्रधान रहता है। स्त्री पुरुष के साथ अन्तरंग भाव में जीती है। देह के सम्बन्ध पितृगृह में छूट जाते हैं।
दाम्पत्य भाव में पुरुष शरीर से जीता है (भीतर के अल्प पोषण से) तथा स्त्री मन से जीती है। भीतर पुरुषवत् संकल्पवान भी होती है। अत: हर स्थिति में वही संचालिका बनी रहती है। पुरुष में आहुत होने के लिए आती है- विवर्त बनाने की भूमिका में। माया ब्रह्म की शक्ति है- पत्नी स्वरूप में भी वह माया रूप शक्ति है। चूंकि माया के सभी कर्म अंधकार में होते हैं और मौन रहकर निष्पन्न किए जाते हैं, अत: स्त्री रूप में माया की दिव्यता गौण रह जाती है। जहां पुरुष भी यदि अपने माया भाव को समझता है, वहां स्थिति दूसरी हो जाती है। उसे स्त्री के गर्भ में ब्रह्म दिखाई देता है। पत्नी की दिव्यता का सम्मान करता है।
स्त्री की आन्तरिक ऊर्जाएं- स्पन्दन-भावनाएं और श्रद्धा भीतर कार्य करते हैं, किन्तु मौन के पर्दे में। उसका लक्ष्य ब्रह्म को आमंत्रित करना, ब्रह्म को पुरुष शरीर से स्वयं के शरीर में लाकर प्रतिष्ठित करना, परिवार के अनुरूप संस्कारित करके सौंप देना। ये सभी कार्य भी अंधकार में ही सम्पन्न होते हैं। मौन की स्थिति में पुरुष को भनक भी नहीं पड़ती कि माया उसके शरीर से क्या चुराकर ले गई। उसका जीवांश भी ब्रह्मांश के साथ गया। दोनों की क्रियाओं के लक्ष्य भिन्न रहते हैं।
माया रूपा स्त्री अपनी देह से जीवात्मा के लिए नई देह का निर्माण करती है। कौन देख पाता है। जीवात्मा में एक पिता का अंश होता है, दूसरा आने वाले आत्मा का। नया जीव किस शरीर को छोड़कर आया, उसी अनुसार शिक्षित करके परिवार में जीने लायक बनाती है। आज चूंकि स्त्री ने अपना यह कार्य बन्द कर दिया है, अत: नया जीव भी पुराने संस्कारों के साथ ही नई देह में प्रवेश कर जाता है। वैसा ही समाज का स्वरूप बन जाता है। जैसा आज चारों ओर दिखाई देता है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com