पुस्तक दिवस विशेषः सभ्यता का आईना हैं पुस्तकें

डॉ. नरेन्द्र इष्टवाल

आज से चार दशक पहले जब टेलीविजन भारत के घर-घर पांव पसार रहा था, तब कुछ पुस्तक-प्रेमी पुस्तक के भविष्य को लेकर काफी चिंता व्यक्त कर रहे थे। उनकी चिंता थी कि घर-घर में टेलीविजन की मौजूदगी पुस्तक के भविष्य को खत्म कर देगी, क्योंकि टेलीविजन के कारण पुस्तक के लिए व्यक्ति के पास समय ही नहीं होगा, लेकिन हुआ इसका एकदम उल्टा। ‘चंद्रकांता संतति’ और ‘तमस’ जैसे धारावाहिकों के टेलीविजन पर प्रसारण के बाद इन उपन्यासों की बिक्री में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई। टेलीविजन पर ‘राग दरबारी’ धारावाहिक के प्रसारण के बाद श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ हर रेलवे स्टेशन की बुक स्टॉल पर नजर आने लगा था। यह ठीक वैसा ही था जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार को देखकर कुछ मीडिया विशेषज्ञ समाचार पत्रों के भविष्य को लेकर चिंतित थे, लेकिन ज्यों-ज्यों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रसार हुआ, त्यों-त्यों समाचार पत्रों की प्रसार संख्या भी बढ़ने लगी। जिस तेजी से नए-नए समाचार चैनल शुरू होने लगे, उसी तेजी से समाचार पत्रों के नए-नए संस्करण भी शुरू होने लगे। ऐसी ही कुछ चिंता तब व्यक्त की गई थी जब बाजार में ‘ई-बुक’ लॉन्च की गई थी। कहा जा रहा था कि जब कंप्यूटर और मोबाइल पर ही पाठक को पढ़ने के लिए डिजिटल पुस्तक उपलब्ध हो रही है, तो पाठक पन्नों पर छपी पुस्तक को रखने का झंझट क्यों करेगा। लेकिन ई-बुक्स के आने से किताबों की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। यह ठीक ऐसा ही है जैसे प्यास लगने पर व्यक्ति कोल्ड ड्रिंक पीता है, लेकिन जिस तरह कोल्ड ड्रिंक पानी का विकल्प नहीं बन सकती, उसी तरह टेलीविजन या ‘ई-बुक्स’ पुस्तक का विकल्प नहीं बन पाई हैं। पुस्तक और टेलीविजन में आधारभूत अंतर यह भी है कि पुस्तक अपने पाठक के साथ संवाद स्थापित करती है और पाठक को आत्म-साक्षात्कार का अवसर देती है। पुस्तक अपने पाठक को अपनी स्वतंत्र सोच बनाने और कल्पना करने का अवसर भी देती है। इसके विपरीत टेलीविजन दर्शकों के लिए सूचना और मनोरंजन का साधन तो हो सकता है, लेकिन वह अपने दर्शकों को किसी भी तरह की स्वतंत्रता नहीं देता। टेलीविजन अपने दर्शकों पर हावी हो जाता है, वह अपने दर्शकों को दृश्य परोसता है। वह दर्शक को सोचने और अपनी कल्पना करने का अवसर ही नहीं देता। वह दर्शकों के मानस पर अपने दृश्य थोप देता है। पुस्तक व्यक्ति को आंतरिक और बौद्धिक रूप से जितना समृद्ध और संपन्न करती है, उतना टेलीविजन अपने दर्शकों को करता है या नहीं, यह आज भी एक बड़ा सवाल है।
पुस्तक हमारे जीवन से गहरे तक जुड़ी है। पुस्तक के साथ हमारे जीवन का एक संस्कार जुड़ा है। हमारे जीवन के सोलह संस्कारों में से एक संस्कार बच्चे के विद्यारंभ का भी है। इसी संस्कार के साथ पुस्तक का हमारे जीवन से जुड़ाव हो जाता है, जो जीवन पर्यंत चलता है। हमारे जीवन में पुस्तक का क्या महत्व है और हमारे मन में पुस्तक के प्रति कितना सम्मान का भाव है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंटरनेट के इस युग में भी हम छपी हुई किसी पुस्तक के नीचे गिर जाने पर उसे हाथों से उठाकर सबसे पहले अपने माथे से लगाते हैं। पुस्तक के प्रति हमारे मन में इसी सम्मान भाव के कारण हम आज भी छपे हुए शब्द को ‘ब्रह्म’ मानते हैं। छपे हुए शब्द के प्रति यह जो हमारा सम्मान का भाव है, वह अन्य किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के प्रति हो ही नहीं सकता। पुस्तक ज्ञान का अतुल खजाना होती है। यह एक ऐसा खजाना है जिसे पाठक चाहे जितना भी ले ले, वह कभी खत्म नहीं होता। यही वजह है कि कई साल पहले प्रकाशित हुई पुस्तक आज भी अपने पाठक को उतना ही आनंद देती है जितना कभी उसने अपने पहले पाठक को दिया होगा। ‘रामचरितमानस’ आज भी पढ़ने वाले पाठक को वही आनंद की अनुभूति देती है, जो उसने सैकड़ों वर्षों पहले पाठकों को दी होगी।
पुस्तक मानव सभ्यता के संचित ज्ञान का कोष है। पुस्तक के साथ व्यक्ति का सदियों पुराना और आत्मिक रिश्ता है। यही कारण है कि पुस्तक को इंसान का सबसे अच्छा मित्र माना जाता है। एक अच्छी पुस्तक पढ़कर हम आज भी अपने अंदर बदलाव महसूस कर सकते हैं। कई प्रसिद्ध व्यक्तियों ने यह कहा है कि किसी पुस्तक ने कैसे उनका पूरा जीवन ही बदल दिया और कैसे जीवन के मुश्किल क्षणों में किसी पुस्तक ने उन्हें राह दिखाई। महात्मा गांधी तो गीता को ‘गीता माता’ तक कहते थे। गांधी जी कहते हैं कि मैं तो सारी कठिनाइयों में गीता-माता के पास दौड़ा आता हूं। व्यक्ति के जीवन के मुश्किल समय और निराशा के क्षणों में कोई पुस्तक ही उसका सहारा बनती है। पुस्तकें अपने पाठक को ज्ञान तो देती ही हैं, वह उसे विवेकशील, विचारवान, कल्पनाशील और संस्कारवान भी बनाती हैं। पुस्तकें अपने पाठक को दुनिया को देखने की अंतर्दृष्टि भी देती हैं। पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह दूसरों के अनुभवों को हमारे अनुभव बनाती है। हमने भले ही कभी पर्वतारोहण नहीं किया हो, लेकिन किसी पर्वतारोही ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ते वक्त कैसा अनुभव किया होगा, यह हम किसी पर्वतारोही की लिखी पुस्तक को पढ़कर जान सकते हैं। पुस्तक कितनी ताकतवर होती है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर तानाशाह शासक का पहला निशाना पुस्तक ही बनती है। यही वजह है कि 1193 ई. में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने भारत के ज्ञान के केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था। पुस्तकें हमारी सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, हमारी सभ्यता और संस्कृति का आईना भी होती हैं। उनके प्रति अनुराग हमें वैचारिक रूप से समृद्ध बनाता है।