शरीर ही ब्रह्माण्ड: नाम ब्रह्म का-प्रपंच माया के

ब्रह्म ने माया को पैदा किया ताकि ब्रह्म का विस्तार हो सके। तब शायद ब्रह्म ने नहीं सोचा होगा कि माया इतना कुछ कर देगी। माया ने तो जीव को इतना बांध दिया, भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के विषयों के साथ, इतनी चकाचौंध के साथ कि वह माया के चक्कर में अपना स्वरूप ही भूल बैठा है। माया ने तो स्वयं ब्रह्म को पिंजरे में बन्द करके लाचार बना दिया है। केवल मानव योनि में ही एक विकल्प रह जाता है उसके पास, मुक्त होने का।

माया होशियार है, झूठी है, ठगिनी है। जीव को जाल में ऐसे बांधती है कि जीव बन्धन को अपनी विजय यात्रा मानकर गौरवान्वित होता जाता है। मानो जीवन गोल्फ का खेल है। पूरा मैदान मन को प्रसन्न करने वाला होता है- हरा भरा। खिलाड़ी को चारों ओर फैले ‘होल’ में गेंद डालनी होती है। जीवन में इन्द्रियों के विषय इन्हीं ‘होल’ की तरह बांधते हैं। खाना, देखना, सुनना आदि विषय मन को सुख की अनुभूति देते जाते हैं।

इसी प्रकार प्रत्येक होल किसी सम्बन्ध का सूचक भी हो सकता है। इनके साथ बंधना भी प्रसन्नता का कारक बनता है। जबकि जीव के लिए ये ही भविष्य के ऋणानुबन्ध पैदा करते हैं। माया को इन होल का प्रतिनिधि तत्व मानकर जीवन की गति और प्रकृति का खेल समझा जा सकता है। इन सभी ‘होल्स’ पर विजय पाना ही खिलाड़ी की जीत मानी जाती है। खेल का मैदान ही विश्व का रूप है। कोई होल किसी एक देश में स्थित है तो कोई किसी दूसरे देश में। माया, व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) को वहां लाकर बांधने का प्रयास करती है। व्यक्ति बार-बार वहां जाते हैं। स्वयं को विजयी मानकर लौटते हैं। यही माया की परोक्ष भाषा है, जो ब्रह्म को नहीं आती। ब्रह्म पूरी उम्र भ्रमित रहता है – माया के आवरण में-
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता 18/61)

जब स्वयं ब्रह्म उसका पार नहीं पा सकते, उसके बन्धन से उसकी मर्जी के बिना नहीं छूट सकते, तब साधारण जीव की क्या ताकत है। कृष्ण स्वयं कह रहे है—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। (गीता 7/14)

यह मेरी त्रिगुणमयी माया बड़ी दुस्तर है। जो मुझको ही भजते हैं वे इसको पार कर जाते हैं।
माया अज्ञान है, भटकाव है, मिथ्या दृष्टि है। वेदान्त में भगवान की बाह्य शक्ति है जो निर्गुण ब्रह्म को सगुण जगत का रूप देती है। इसका मुख्य कार्य जीव को भगवान से विमुख करके संसार में बांधना है।

माया को ब्रह्म की कामना भी कहते हैं। वही ब्रह्म को विभिन्न रूपों में प्रकट करती है। इसी का शक्ति रूप महामाया कहा जाता है जो कि सूक्ष्म शरीर में कार्य करता है। अपनी इच्छा से ही जगत की रचना करती है। यह त्रिगुणात्मक भाव में सम्पूर्ण सृष्टि को बांधकर रखती है। जबकि योगमाया ईश्वर की आन्तरिक शक्ति है। महामाया ईश्वर से विमुख करती है और योगमाया जोड़ती है। योगमाया निर्गुण और सत्वमयी है। योगमाया ईश्वर के ऐश्वर्य को ढक देती है। यह प्रेम की गहनता के लिए है, मोह नहीं है। भक्तों को जोड़े रखना है। जब चेतना स्थूल से उठकर सूक्ष्म भाव जगत में प्रवेश करती है, तब महामाया का आवरण हटने लगता है। योगमाया प्रकट होती है।

माया के कारण मन चंचल होता है। मन की चंचलता ही भटकाव है। मन ही हमें हमारा अस्तित्व लगने लगता है तब सारे विषय-अर्थ बदलने लगते हैं। मन यदि वस्तुस्थिति को जान ले, उसका वास्तविक ज्ञान होना ही माया से पार पाना है। माया मृगतृष्णा पैदा करती है। धन-सत्ता-रूप आदि का मोह, माया के प्रभाव से ही होता है। मोह के कारण हम नाशवान को शाश्वत, अपवित्र को पवित्र, दु:ख को सुख, शरीर को आत्मा समझने लगते हैं। हमारे मन में आसक्ति भाव का बढऩा भी मोह का एक रूप है। इसके कारण व्यक्ति, वस्तु या स्थिति से अत्यधिक रूप में बंध जाते हैं। उसके बिना जीवन को अपूर्ण ही समझते है। भावनात्मक रूप में हुआ यह जुड़ाव पीड़ा का कारण भी बन जाता है। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाला यह मोह आत्मा को पतन की ओर ले जाता है—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता 3.37)

रस जीवन का आनन्द है – प्रेम है – न्यौछावर है। नीरस मन थक जाता है। तब प्राण शिथिल पड़ जाते हैं। प्राण जीवन की गति है। प्राण ही रूपान्तरण है। रस चिति प्रभावित होने लगती है। सही में जीवन की गति ही तय करता है। प्रकृति के साथ रहकर भी, विरुद्ध रहकर भी।

अव्यय पुरुष ही ब्रह्म रूप आधार है सृष्टि का। माया से आवृत सृष्टि मन ‘बहुस्याम’ का मार्ग है। मुक्ति भाव, मुमुक्षा भाव पुन: ब्रह्म में लीन हो जाने का मार्ग है। दोनों ही प्रकार की कामना का मूल आधार माया है। दाम्पत्य भाव में इसका समावेश दिखाई देता है। माया के स्वरूप में काल के साथ मन के भावों में भी परिवर्तन होता है, आश्रम व्यवस्था में भी परिवर्तन होता है। इसके साथ ही जीवन की कुछ सैद्धान्तिक अनिवार्यताएं भी रहती हैं। एक दीये को सौ साल जलना है तो कितने पीपे तेल चाहिए? जहां तेल बीता, वहां दिया रीता।

पुरुष अपने ब्रह्मचर्य काल में अपने पौरुष और ज्ञान को परिपक्व करता है। चन्द्रमा की सोलह कलाओं का भोग भी करता है। चाहे वह घर पर रहे, चाहे गुरुकुल में, उसके स्त्रैण स्वरूप के पोषण में कमी रहती ही है। आज तो गुरुकुल वैसे कहां रहे। ग्रन्थों को रटाते हैं। वहां आत्मा को पुष्ट करने का कार्य ठहर सा गया। ध्यान जैसी परम्पराओं ने व्यायाम का रूप ले लिया। गुरु-शिष्य एकाकार होते ही नहीं हैं।

उधर स्त्री का स्वरूप भी बदल रहा है। उसे ब्रह्म के जीवन में अद्र्धांगिनी बनना है। उसका विवर्त बनाना है और उसी में समा जाना है। अन्त में ब्रह्म वहीं लौट जाए जहां से आया था। माया को ब्रह्म का कार्य करके चले जाना है। माया बल का नाम है, किसी प्राणी का नाम नहीं है। ब्रह्म भी रस है। उसको स्वरूप देकर उसका पोषण करना ही माया का काम है। माया चेतना है। रस में बलों की चिति करके स्वरूप का निर्माण करती है।

विडम्बना ही है कि जीता ब्रह्म है, विवर्त सारा उसी का है, और दिखाई माया ही देती है – ब्रह्म तो मानो गौण है। सारा विश्व ब्रह्म का है, लेकिन ब्रह्म में कर्ता भाव नहीं है और न ही ब्रह्म को सीमित किया जा सकता है। अत:, सारा प्रपंच माया का है। सारा विश्व बलों की चिति है, भिन्न-भिन्न बलों पर। माया ने ब्रह्म को ठग लिया और विश्व को स्वयं के वश में कर लिया। ब्रह्म को ढक लिया और ब्रह्म के नाम से स्वयं की इच्छा का व्यापार शुरू कर दिया। सृष्टि की चाल उल्टी हो गई। ब्रह्म के नाम से माया की इच्छा (जीवेच्छा) प्रबल हो गई और विश्व में एक नया ताण्डव शुरू हो गया।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com