(कल के अंक से जारी…)
माननीय प्रधानमंत्री जी !
राजनयिकों की नियुक्ति में विविधता इसलिए भी जरूरी है कि कला, साहित्य, विज्ञान, खेल और उद्योग जगत के अनुभवी लोग भारत की बहुआयामी पहचान को दुनिया के दूसरे देशों में बेहतर तरीके से पेश कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति, परम्परा के साथ-साथ आधुनिकता का संगम हो तो राजनयिकों की भूमिका और सार्थक साबित हो सकती हैं। हर जगह नौकरशाह को नियुक्त करने से नागरिक समाज की भागीदारी कमजोर पड़ जाती है।
गैर नौकरशाही पृष्ठभूमि के लोगों के पास निश्चित ही नई दृष्टि और ऊर्जा होती है। जहां तक हमारे राजदूतों और उच्चायुक्तों की नियुक्ति का सवाल है, भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को इन पदों से सर्वथा दूर रखने की जरूरत भले ही नहीं हो, लेकिन ऐसे व्यक्तियों को भी मौका दिया जाना चाहिए जो नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन में दक्ष तो हों ही अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में भी पहचान रखने वाले हों।
एक दशक पहले सरकार ने खुद संसद में एक सवाल के जवाब में बताया था कि भारत की प्राथमिकताओं, विशिष्ट राजनयिक मिशन की आवश्यकताओं और अनुभव, वरिष्ठता, क्षेत्रीय एवं व्यावसायिक विशेषज्ञता सहित उनकी समग्र उपयुक्तता को ध्यान में रखते हुए राजदूतों, उच्चायुक्तों और स्थायी प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है।
हाल ही पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया है। भारतीय विदेश सेवा और प्रशासनिक सेवाओं से इतर व्यक्तियों की राजदूत व उच्चायुक्त के पदों पर पहले भी नियुक्तियां हुई हैं। इनमें पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पूर्व सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग, इतिहासकार के.एम. पणिक्कर, ख्यातनाम अधिवक्ता एलएम सिंघवी, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर, जयपुर राजपरिवार के ब्रिगेडियर भवानीसिंह आदि नाम प्रमुख हैं।
सीधी सी बात है, उद्योगपतियों या अर्थशास्त्रियों को राजदूत बनाने से दुनिया के देशों से व्यापारिक संबंध बनाने और वहां से निवेश को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है। यही बात वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों पर लागू होती है जिनकी नियुक्ति भारत की नवाचार क्षमता को दुनिया के देशों में प्रचारित करने वाली हो सकती है। इसी तरह से खेल जगत की हस्तियां भारत की युवा ऊर्जा व खेल क्षमता का संदेश पहुंचाने में कामयाब हो सकती है।
माननीय, यह भी एक सवाल है कि जनता से जुड़े मामलों को लेकर बनने वाली संस्था, कमेटी व आयोग आदि के मुखिया प्रशासनिक सेवा के अफसर ही क्यों हो? शिक्षा से जुड़े आयोग में शिक्षाविद, पर्यावरण से जुड़े विषय पर पर्यावरणविद और विज्ञान से जुड़े विषयों पर वैज्ञानिकों की नियुक्ति अलग ही संदेश देने वाली होंगी।
नौकरशाहों के पास शासन-प्रशासन का व्यापक अनुभव होता है, वे नियम-कानून और प्रक्रियाओं को समझते हैं। लेकिन जब बात किसी विशिष्ट क्षेत्र की आती है-जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, कृषि या तकनीक, तो केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, पर्यावरण आयोग में यदि वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की भागीदारी अधिक हो तो नीतियां जमीनी हकीकत और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होंगी।
विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करते हैं। जब आयोगों और समितियों में गैर-नौकरशाह, यानी न्यायविद, शिक्षाविद, वैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं, तो उनके निर्णय अधिक गहरे, व्यावहारिक और जनहितकारी साबित होते हैं। आपकी सरकार को चाहिए कि नौकरशाही और विशेषज्ञता के बीच संतुलन बनाए, ताकि नीतियां केवल प्रशासनिक औपचारिकता न रहकर समाज की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने वाली बन सके।
राजनयिकों के साथ-साथ अन्य प्रमुख जिम्मेदारियां जब अनुभवी और अपने क्षेत्र में पहचान रखने वालों को दी जाएंगी तो उम्मीद की जा सकती है कि न केवल राजनयिक कामकाज बल्कि सामान्य प्रशासनिक कामकाज भी अलग ही दृष्टिकोण वाला होगा। कई देशों में आयोगों और समितियों में विशेषज्ञों को प्राथमिकता दी जाती है। अमरीका और यूरोप में स्वास्थ्य आयोगों में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की भागीदारी अनिवार्य होती है। भारत भी यदि इस दिशा में कदम बढ़ाए तो नीतियों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता बढ़ेगी।
एक चलन हमारे यहां अंग्रेजों के जमाने से बना हुआ है। आज भी राज्यों में ग्रीष्मकालीन राजधानी, और कहीं-कहीं शीतकालीन राजधानी बनाना लगता है कि धन की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं। आज हर कहीं एयरकंडीशनर उपलब्ध है। फिर गर्मी कैसी? सर्दी से बचाव के उपाय भी संभव हैं, फिर सर्दी कैसी? बस नेताओं और अफसरों के ऐशोआराम की व्यवस्थाओं के नाम पर दो-दो राजधानियां रखने की कहां तुक है। माननीय प्रधानमंत्री जी, कुल मिलाकर ढर्रा बदलना ही होगा। आपके नेतृत्व में यह काम हो जाए तो जनता के हित में फैसले इससे अच्छे भला और क्या होंगे?
क्रमशः gulabkothari@epatrika.com