सीतामाता मंदिर, वन्यजीव और दुर्लभ वनस्पतियां… प्रतापगढ़ का यह अभयारण्य बना आकर्षण का केंद्र

Rajasthan Eco Tourism: प्रमुख प्राकृतिक धरोहरों में शामिल प्रतापगढ़ में सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य जैव विविधताओं, धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक सौदर्य का अनूठा संगम है। अरावली, विंध्याचल और मालवा के पठारों के बीच फैला यह अभयारण्य प्रदेश के अन्य अभयारण्यों से अलग पहचान रखता है। यहां वन विभाग की ओर से इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए कई विकास कार्य कराए गए है, लेकिन अब भी इस क्षेत्र में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार की बड़ी आवश्यकता महसूस की जा रही है।

423 वर्ग किलोमीटर में फैला सीतामाता अभयारण्य प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है। यहां पेड़-पौधों, औषधीय वनस्पतियों, दुर्लभ जीव जंतुओं और पक्षियों की समृद्ध विविधता देखने को मिलती है। इसके बावजूद आवागमन के सीमित साधन और पर्यटन सुविधाओं की कमी के कारण यह स्थान राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अपेक्षित पहचान नहीं बना सका है। जबकि उदयपुर और चित्तौडगढ़ जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों से इसकी दूरी भी अधिक नहीं है। ऐसे में यदि यहां पर्यटन सुविधाओं का विस्तार हो तो यह क्षेत्र बड़ा दूरिस्ट स्पॉट बन सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।

दुर्लभ ऑर्किड और औषधीय वनस्पतियों का खजाना

पर्यावरणविद् मंगल मेहता के अनुसार सीतामाता अभयारण्य में दुर्लभऔषधीय वनस्पतियों की भरमार है। यहां 330 प्रकार की जड़ी-बूटियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से 33 दुर्लभ प्रजातियां ऐसी हैं जो केवल इसी क्षेत्र में पाई जाती हैं। अभयारण्य में अब तक 11 प्रकार के ऑर्किड प्लांट्स की पहचान हो चुकी है। प्रदेश में स्थलीय ऑर्किड्स की 13 और उपरिरोही की छह प्रजातियां दर्ज की गई हैं। यहां पाए जाने वाले ऑर्किड औषधीय उपयोग के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

सीतामाता मंदिर से जुड़ी है आस्था और इतिहास

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम ने माता सीता को वनवास भेजा था और उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास किया था। इतिहासविद् मदन वैष्णव के अनुसार लव और कुश का जन्म भी यहीं हुआ था। किंवदंती है कि माता सीता अंततः इसी क्षेत्र में भू-गर्भमें समा गई थीं। इसी कारण इस अभयारण्य का नाम सीतामाता अभयारण्य पड़ा। अभयारण्य क्षेत्र में सीतामाता मंदिर, महर्षि वाल्मीकि आश्रम, लव-कुश बाग, आम के पेड़ और वर्षों पुराना बरगद का पेड़ धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से जुड़े हुए हैं। हर वर्ष यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।

पर्यटकों की संख्या में उतार-चढ़ाव

वर्ष 2020-21 में 17,568 पर्यटक पहुंचे।

वर्ष 2021-22 में यह संख्या घटकर 10,634 रही।

वर्ष 2022-23 में 23.543 पर्यटकों ने भ्रमण किया।

वर्ष 2023-24 में 17,492 पर्यटक पहुंचे।

वर्ष 2024-25 में 24,788 पर्यटकों ने अभयारण्य का भ्रमण किया।

वर्ष 2025-26 में अब तक 21,900 पर्यटक पहुंच चुके हैं।

यह हुए विकास कार्य

वन विभाग की और से अभयारण्य क्षेत्र में पर्यटकों की सुविधा और वन्यजीव संरक्षण के लिए कई विकास कार्य कराए गए है। सहायक वन संरक्षक सोमेश्वर त्रिवेदी ने बताया कि
पर्यटकों की सुविधा के लिए एक वॉच टावर, एक आरओ वाटर पॉइंट, पांच स्थानों पर सिटिंग पॉइंट और तीन व्यू पॉइंट बनाए गए हैं। इसके अलावा चार किलोमीटर लंबे वन पथ का संधारण कराया गया है। वन्यजीवों के लिए 10 आर्टिफिशियल वाटर होल
बनाए गए हैं, जिससे गर्मी में वन्यजीवों को पानी उपलब्ध हो सके। जाखम बांध, पूंगातालाब और आरामपुरा में विश्राम गृह भी बनाए गए हैं। पूंगातालाब क्षेत्र में पांच ट्री-हट तैयार किए गए है, जहां पर्यटक प्राकृतिक वातावरण का आनंद ले सकते हैं।

स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने की संभावना

मानद वन्यजीव प्रतिपालक लक्ष्मणसिंह चिकलाड़ ने कहा कि सीतामाता अभयारण्य में पर्यटन की काफी संभावनाएं है। वन विभाग को स्थानीय लोगों और वन सुरक्षा समितियों के साथ मिलकर योजनाएं बनानी चाहिए, ताकि जंगल संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल सके।

उपवन संरक्षक मुदुलासिंह ने बताया कि अभयारण्य में प्रतिवर्ष इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए विकास कार्य कराए जा रहे हैं। पर्यटकों के ठहरने, भ्रमण करने और प्राकृतिक परिवेश का आनंद लेने के लिए सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। पर्यटकों की मांग के अनुसार आगे भी नए कार्य प्रस्तावित हैं।