स्त्री केवल शरीर नहीं, सृजन की दिव्य चेतना : गुलाब कोठारी

जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि स्त्री को केवल शरीर के रूप में समझना भारतीय दर्शन के मूल भाव के विपरीत है। उन्होंने कहा कि स्त्री सृजन की दिव्य चेतना है और उसके बिना देश, संस्कृति और मानवता का निर्माण संभव नहीं है। समाज को स्त्री की दिव्यता और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना होगा, तभी सृजन और संतुलन संभव होगा।

कांस्टीट्यूशनल क्लब में बुधवार को फिक्की फ्लो की ओर से ‘स्त्री संवेदना, सृजन, संशोधन और स्वाभिमान’ विषय पर उद्बोधन देते हुए कोठारी ने कहा कि जब हम भगवद गीता को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह हमारे लिए ही लिखी गई है, लेकिन इसे जीवन में उतारना सबसे बड़ी चुनौती है। इससे पहले संस्थापक अध्यक्ष नीता बूचरा (जैन) ने फिक्की फ्लो जयपुर चैप्टर की गतिविधियों की जानकारी दी। संचालन सचिव स्वाति छाबड़ा ने किया।

वेद, उपनिषद और गीता आत्मा के लिए लिखे गए

कोठारी ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि हम पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा के बीच खड़े हैं। एक ओर परंपरा का आकर्षण कम हो रहा है, वहीं तकनीक जैसे-रेडियो, टीवी, इंटरनेट और मोबाइल अलग ही दिशा में ले जा रहे हैं। कोठारी ने कहा कि हमारे वेद, उपनिषद और गीता आत्मा के लिए लिखे गए हैं, न कि केवल स्त्री या पुरुष के लिए।

आज भी स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित

कोठारी ने सामाजिक संरचना पर भी चिंता जताते हुए कहा कि असंतुलन की जड़ हमारे घरों से शुरू होती है। भारतीय परिवारों में आज भी स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित है, जो समाज के संतुलन को प्रभावित करती है। कोठारी ने कहा कि जब तक हम स्वयं को शरीर के बजाय आत्मा के रूप में नहीं समझेंगे, तब तक गीता और जीवन के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाएंगे।

महिलाओं की जिज्ञासा दूर हुई, कोठारी ने दिए सवालों के जवाब

प्रियंका जोधावत (आरएएस) : आपके विचारों में गहरी स्त्री-संवेदना और मातृत्व का भाव दिखाई देता है, इसकी प्रेरणा क्या है?

कोठारी : मेरा पूरा चिंतन भारतीय दर्शन और भगवद गीता से प्रेरित है। किसी भी ग्रंथ को समझने के लिए उसकी मूल भावना को अपने जीवन में उतारना जरूरी है। केवल व्याख्याओं पर निर्भर रहने से उसका वास्तविक अर्थ नहीं समझा जा सकता।

शकुंलता रावत (पूर्व मंत्री) : समाज में सादगी, मर्यादा और संस्कारों का क्षरण हो रहा है। इसे फिर से कैसे स्थापित किया जा सकता है ?

कोठारी : इसके लिए सबसे पहले हमें जीवन को शरीर से परे समझना होगा। ‘माया’ वही शक्ति है, जो आत्मा को एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाती है और सृष्टि को संचालित करती है। हमें जीवन, विवाह और संबंधों को नए दृष्टिकोण से समझाने के लिए छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे।

सौम्या गुर्जर (पूर्व मेयर) : समाज और परिवार के बीच संतुलन बनाते हुए बच्चों की उपेक्षा हो जाती है। ऐसे में क्या किया जाए?

कोठारी : बच्चे हमारी संपत्ति नहीं हैं, वे अपनी इच्छा से हमारे जीवन में आते हैं। हमें उन्हें अपनी सोच के अनुसार ढालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। माता-पिता के पास न तो पर्याप्त समय है और न ही धैर्य, जिससे वे बच्चों को सही संस्कार दे सकें। यदि माता अपने भीतर सच्चे मातृत्व भाव को जागृत कर ले, तो अधिकांश समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाएगा।