Jungle Jalebi : डूंगरपुर में ‘जंगली जलेबी’ के हुए लोग दीवाने, हाथों-हाथ हो रही है बिक्री, जाने फायदे

Jungle Jalebi : डूंगरपुर के बनकोड़ा कस्बे सहित आसपास के गांवों में इन दिनों ‘जंगली जलेबी’ (मीठी इमली) की जोरदार आवक हो रही है। यह बाजार में आते ही हाथोंहाथ बिक रही है। जलेबी जैसी कुंडलीनुमा आकृति और मीठे स्वाद के कारण यह हर उम्र के लोगों की पसंद बनी हुई है। करीब 100 रुपए प्रति किलोग्राम के भाव से यह आसानी से उपलब्ध है।

गर्मियों का मौसम शुरू होते ही राजस्थान के कई इलाकों में जंगली जलेबी (पिथेसेलोबियम डुल्से) के मीठे-खट्टे फल बाजारों में दिखने लगे हैं। यह जंगली पेड़ सूखे मौसम में भी अच्छी तरह पनपता है और प्रदेश के आदिवासी इलाकों के लिए आय का अच्छा स्रोत बन गया है।

जंगलों और ग्रामीण इलाकों में पाए जाने वाले इस फल की पहचान इसके अनोखे आकार से होती है। पेड़ों पर लटकी गोल-गोल फलियां पहली नजर में जलेबी जैसी दिखाई देती हैं। अंदर का गूदा मीठा और स्वादिष्ट होता है। अधिकतर जंगलों में मिलने, कुंडलीनुमा बनावट और मिठास के कारण इसे ‘जंगली जलेबी’ या ‘कीकर’ कहा जाता है। यह फल ग्रामीण बचपन की यादों से भी जुड़ा है और लोग इसे सीधे पेड़ से तोड़कर खाने का आनंद लेते हैं।

सेहत का भी खजाना

यह फल पोषणदायक है। इसमें फाइबर, कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस और विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके सेवन से पाचन तंत्र मजबूत होता है और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। फाइबर की मौजूदगी वजन संतुलन में सहायक है, जबकि विटामिन-सी और खनिज तत्व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। यह हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में भी सहायक है।

आदिवासी समुदाय के लिए कमाई का अच्छा जरिया

राजस्थान में जंगली जलेबी सबसे ज्यादा उदयपुर (मेवाड़) क्षेत्र में पाई जाती है। यहां के जंगलों, पहाड़ी इलाकों और गांवों में यह प्रचुर मात्रा में उगती है। उदयपुर के अलावा अजमेर, माउंट आबू, जयपुर और सवाई माधोपुर जिलों में भी सड़कों के किनारे, बंजर भूमि और खेतों की मेड़ पर यह आसानी से मिल जाती है। यह पेड़ सूखा सहन करने की खूबी रखता है, इसलिए राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में यह प्राकृतिक रूप से फैल गया है।

अप्रैल से जून तक जंगली जलेबी’ या ‘कीकर’ के मुड़े हुए फल तोड़े जाते हैं। आदिवासी समुदाय इन फलों को बेचकर अच्छी कमाई करते हैं। जंगली जलेबी न सिर्फ स्वादिष्ट है बल्कि पौष्टिक भी मानी जाती है। वन विभाग के अनुसार यह पौधा पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि यह कम पानी में हरा-भरा रहता है।