अलवर। परिवहन तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करता चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक ही नंबर की दो मोटरसाइकिलें अलग-अलग शहरों में दौड़ रही हैं। एक बाइक अलवर में है और दूसरी उदयपुर में। चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों मोटरसाइकिलों के चेसिस नंबर और इंजन नंबर भी समान हैं। बाइक का नंबर आरजे-02-बीडी 5151 है।
अलवर के बुद्धविहार में डी-ब्लॉक निवासी पुनीत सोनी ने बताया कि उसने 27 जुलाई 2018 को अलवर के टेल्को सर्किल स्थित आरएस मोटर्स से बुलेट मोटरसाइकिल खरीदी थी। दस्तावेज भी उसके पास हैं। करीब एक महीने पहले जब वह प्रदूषण की जांच कराने पहुंचा, तो सिस्टम में उसकी बाइक उदयपुर आरटीओ क्षेत्र में रंजीत अहारी (थर्ड ऑनर) के नाम दर्ज मिली।
रंजीत ने यह बाइक हनुमानगढ़ के किसी व्यक्ति से खरीदी। पुनीत का दावा है कि उसने अपनी बाइक किसी को बेची ही नहीं है। इसकी शिकायत दर्ज कराने पुनीत 9 अप्रैल को अलवर के शिवाजी पार्क थाने में पहुंचा। पुलिस ने इसे आरटीओ से जुड़ा मामला बताया और फिर क्षेत्राधिकार का हवाला देकर विजयमंदिर थाने भेज दिया। वहां भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई।
आरटीओ कार्यालय के अधिकारियों ने कहा कि यह गड़बड़ी हनुमानगढ़ में हुई है, इसलिए हनुमानगढ़ चले जाओ। पुनीत ने उदयपुर में चल रही बाइक के मालिक से संपर्क किया, तो उसने कहा कि मैंने तो यह बाइक खरीदो-बेचो प्लेटफॉर्म से 1.60 लाख रुपए में खरीदी है।
मेरी बाइक, किसी दूसरे के नाम, फिर मैं ही कठघरे में क्यों?
बाइक के साथ खड़ा पुनीत सोनी गाड़ी के दस्तावेज दिखाते हुए।
मैंने अपनी बाइक कभी बेची ही नहीं, फिर भी कागजों में वह तीसरे मालिक के नाम कैसे पहुंच गई। यह समझ से परे है। एक महीने से थानों और आरटीओ के चक्कर काट रहा हूं, लेकिन हर जगह से सिर्फ टालमटोल मिल रही है। मैं कृषि उपज मंडी में प्राइवेट नौकरी करता हूं। मुझे डर है कि अगर उस दूसरी बाइक से कोई वारदात हो गई, तो पुलिस मेरे दरवाजे पर खड़ी होगी। अपनी ही गाड़ी का मालिक होते हुए भी मेरे सामने खुद को बेगुनाह साबित करने की नौबत न आ जाए। इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है।
पुनीत सोनी, बाइक मालिक, अलवर
पत्रिका व्यू: कागजों का खेल या सिस्टम की चूक?
यह मामला न केवल परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि आम नागरिक की सुरक्षा और कानूनी जोखिम को भी उजागर करता है। एक ही नंबर, वही चेसिस और इंजन नंबर-फिर भी दो अलग-अलग शहरों में दो बाइक। सवाल सिर्फ एक वाहन का नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का है।
अगर रिकॉर्ड इस तरह बदल सकते हैं, तो किसी भी आम नागरिक की पहचान और संपत्ति कभी भी विवाद में फंस सकती है। जिम्मेदार विभागों की खामोशी इस आशंका को और गहरा कर रही है कि कहीं यह लापरवाही से ज्यादा बड़ी प्रणालीगत चूक है, जिसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है।