सुनहरी धोरों की धरती जैसलमेर केवल अपने किले, हवेलियों और रेतीले विस्तार के लिए ही नहीं, बल्कि समृद्ध लोक संस्कृति और नृत्य परंपराओं के लिए भी विश्वभर में पहचाना जाता है। अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के अवसर पर जब दुनिया भर में नृत्य की विविध विधाओं का उत्सव मनाया जा रहा है, तब जैसलमेर के लोक नर्तक अपनी मिट्टी की खुशबू, परंपरा की गरिमा और कला की ऊर्जा से इस दिन को विशेष अर्थ दे रहे हैं। यहां का हर लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवनशैली, इतिहास और सामाजिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। घूमर की शालीनता, कालबेलिया की लयात्मकता, चरी नृत्य की सौम्यता और मांगणियार-लंगा समुदाय की संगीत-नृत्य परंपराएं जैसलमेर को सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट बनाती हैं। पर्यटन सीजन में देश-विदेश से आने वाले सैलानी इन प्रस्तुतियों को देखकर मंत्रमुग्ध हो उठते हैं। जैसलमेर के कई नृतक कलाकार तो महिलाओं की वेशभूषा में हूबहू उनकी भंगिमाओं व लोच के साथ नृत्य कर देखने वालों को चौंकने पर मजबूर कर देते हैं।
हर शाम होती है नृत्य कौशल की गवाह
जैसलमेर के सम, खुहड़ी के रेतीले धोरों में बने रिसोट्र्स, जैसलमेर के सितारा होटलों से लेकर सांस्कृतिक आयोजनों में हर शाम लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां रेगिस्तान को जीवंत कर देती हैं। पारंपरिक वेशभूषा, मंजीरे, ढोलक, ढोल, खड़ताल और कमायचा की धुनों पर थिरकते कलाकार न केवल दर्शकों का मनोरंजन करते हैं, बल्कि राजस्थान की विरासत को भी दुनिया तक पहुंचाते हैं। हालांकि इन कलाकारों का जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। मौसम पर आधारित पर्यटन, सीमित आय, मंचों की कमी और नई पीढ़ी का अन्य व्यवसायों की ओर रुझान जैसी चुनौतियां सामने हैं। इसके बावजूद कई कलाकार अपने परिवारों में नई पीढ़ी को लोकनृत्य सिखाकर इस धरोहर को बचाए हुए हैं। लोक कलाकारों का कहना है कि यदि सरकारी और निजी स्तर पर अधिक मंच, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग मिले तो जैसलमेर की लोकनृत्य परंपरा और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंच सकती है।
कलाकारों को सरकारी प्रोत्साहन की दरकार
मैं पिछले करीब 38 साल से घुटना चकरी नृत्य कर रहा हूं। मैंने शाहरूख खान की पहेली फिल्म में काम किया। सोनी टीवी पर इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा कार्यक्रम में भागीदारी की है। करीब 45 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका हूं। वर्तमान में सोशल मीडिया पर रील्स के माध्यम से बहुत गंदगी फैलाई जा रही है। सरकारी कार्यक्रमों में लोक कलाकारों को आमंत्रित कर उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।’’
– आनंदसिंह सोलंकी उर्फ अनू सौलंकी, नृतक
मरु-महोत्सव में पर्याप्त सम्मान नहीं मिलने से मायूसी
‘मैं मुख्यत: भवई और चकरा नृत्य करता हूं। पिछले 30 साल से इस पेशे में हूं और देश-प्रदेश के अलावा कई देशों में लोक नृत्य का प्रदर्शन करने का मौका मिला है। सरकार से लोक कलाकारों को किसी तरह का प्रोत्साहन हालिया वर्षों में नहीं मिल रहा है। जैसलमेर में प्रतिवर्ष होने वाले मरु महोत्सव में भी बाहरी कलाकारों का बोलबाला रहता है और हमें तिरस्कृत किया जाता है। यह नहीं होना चाहिए। पर्यटन सीजन ऑफ होने के दौरान हमारे सामने बेरोजगारी का संकट रहता है।
– चेलूराम, नृतक
…ताकि जैसलमेर की लोक संस्कृति दुनिया के हर मंच तक पहुंचे
पुराने समय में होली और लोक आयोजनों जैसे रम्मत में महिलाओं के नृत्य करने पर पाबंदी होती थी। उस समय पुरुष ही महिला वेश धारण कर लोकनृत्य प्रस्तुत करते थे। मैं उसी परंपरा को आज भी जीवित रखने का प्रयास कर रहा हूं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रदर्शन करने का अवसर मिला है। बचपन से ही लोककला से जुड़ाव हो गया। भवई, चरी, घूमर, कालबेलिया, तेरहताली, घुटना चकरी सहित 15 से अधिक नृत्य विधाओं में दखल है। दिवंगत लोक कलाकार क्वीन हरीश मेरे आदर्श हैं। वर्तमान में डांस टीचर के रूप में नई पीढ़ी को प्रशिक्षण दे रहा हूं और मेरा सपना है कि जैसलमेर की लोक संस्कृति दुनिया के हर मंच तक पहुंचे और युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहें।
– आवड़ सैन, नृतक
एक्सपर्ट व्यू- नृत्य हमारी विरासत, नई पीढ़ी को इससे जोड़ना जरूरी
घूमर हमारे लिए केवल नृत्य नहीं, सम्मान और संस्कृति का प्रतीक है। राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिव्या कुमारी की पहल पर घूमर नृत्य फेस्टिवल आयोजित किया गया। साल में एक बार घूमर दिवस प्रत्येक पंचायत व जिला स्तर पर मनाया जाना चाहिए। रियासतकाल से राजस्थान में घूमर नृत्य प्रत्येक जाति-समुदाय के लोग करते आए हैं। नई पीढ़ी को इससे जोडऩा जरूरी है।
– गाजी खां बरना, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार