ईरान-अमरीका और इजरायल देशों में लड़ी जा रही जंग का असर राजस्थान के गांवों और शहरों के चूल्हे तक कैसे पहुंचता है, इसका एक जीता-जागता उदाहरण इस समय कृषि मंडियों में देखने को मिल रहा है। जंग के त्रिकोणीय तनाव ने अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजार को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। इस वैश्विक संकट की मार अब आम आदमी की थाली पर पड़ रही है। दौसा जिले की लालसोट कृषि उपज मंडी से आई ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 10 दिनों में पीली क्रांति यानी सरसों के बाजार में एक अभूतपूर्व भूचाल आया है। जो सरसों कुछ दिन पहले तक सुस्त पड़ी थी, उसके दाम अचानक रॉकेट की रफ्तार से भागने लगे हैं।
लालसोट मंडी की लाइव रिपोर्ट
मंडी के ग्रेन मर्चेंट एसोसिएशन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों और व्यापारियों के अनुसार, मई महीने की शुरुआत में लालसोट कृषि उपज मंडी में सरसों का भाव सामान्य स्तर यानी ₹6800 प्रति क्विंटल के आसपास बना हुआ था।
लेकिन 10 मई के बाद से बाजार का मूड अचानक बदल गया। मंडी में हर दिन ₹50 से लेकर ₹100 प्रति क्विंटल तक की रिकॉर्ड तेजी दर्ज की जाने लगी। देखते ही देखते बुधवार को लालसोट मंडी में सरसों के टॉप एलीट क्वालिटी के भाव ₹7500 प्रति क्विंटल तक पहुंच गए।
ग्रेन मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष सत्यनारायण सोंखिया, पूर्व अध्यक्ष नवल किशोर झालानी एवं सुरेश चौधरी ने संयुक्त रूप से बताया कि विदेशों से खाद्य तेलों के आयात पर लगे ब्रेक के कारण भारतीय बाजार में घरेलू सरसों की मांग अचानक चरम पर पहुंच गई है।
टीन और खुले तेल के दाम आसमान पर
सरसों की कीमतों में आए इस भयंकर उछाल ने सीधे तौर पर तेल मिलों और खुदरा बाजार को अपनी चपेट में ले लिया है। आम उपभोक्ताओं के लिए कड़वा तेल खरीदना अब पसीने छुड़ाने जैसा साबित हो रहा है।
सरसों तेल कारोबारी गोविंद चौधरी ने इस तेजी का पूरा गणित बताया:
तेल की टीन महंगी: कुछ दिन पहले तक जो सरसों तेल का पीपा/टीन थोक में ₹168 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा था, वह अब बढ़कर ₹175 रुपये प्रति किलो के थोक स्तर तक पहुंच गया है।
खुदरा बाजार का हाल: यदि आप खुदरा किराना दुकान से एक लीटर या एक किलो सरसों का तेल खरीदने जाते हैं, तो खुले बाजार में इसके भाव ₹180 रुपये प्रति किलो के पार जा चुके हैं।
पशु आहार (खल) पर भी मार: केवल तेल ही नहीं, बल्कि दुधारू पशुओं को खिलाई जाने वाली सरसों की खल के दामों में भी प्रति क्विंटल करीब ₹300 की भारी बढ़ोतरी हो चुकी है, जिससे राजस्थान के डेयरी किसानों और पशुपालकों की लागत भी बढ़ गई है।
क्यों भड़की सरसों की आग? 6 सबसे प्रमुख कारण
राजस्थान की मंडियों में सरसों के इस तरह अचानक बेकाबू होने के पीछे कोई एक स्थानीय कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और रणनीतिक फैक्टर्स काम कर रहे हैं।
व्यापारियों और कृषि विशेषज्ञों के विश्लेषण के आधार पर इस महा-तेजी के 6 मुख्य कारण हैं:
विदेशी खाद्य तेलों में उछाल: इंटरनेशनल मार्केट में पाम ऑयल और अन्य खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ गई हैं।
हॉर्मूज जलडमरूमध्य संकट (Hormuz Strait Crisis): युद्ध के कारण इस समुद्री मार्ग से होने वाली सोया ऑयल और सूरजमुखी (Sunflower) तेल की वैश्विक आपूर्ति पूरी तरह प्रभावित हुई है।
कमजोर रुपया: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई कमजोरी के कारण खाद्य तेलों का आयात करना बेहद महंगा हो गया है।
बायोडीजल का बढ़ता उपयोग: दुनिया के कई विकसित देशों में खाद्य तेलों को डायवर्ट करके बायोडीजल बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है।
घरेलू उत्पादन में गिरावट: इस बार मौसम की मार और बेमौसम बारिश के कारण भारत में सरसों उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत की कमी आंकी गई है।
अंतरराष्ट्रीय फसलें कमजोर: अर्जेंटीना सहित कई बड़े तेल उत्पादक देशों में इस साल फसल का उत्पादन उम्मीद से बेहद कमजोर रहा है।
लालसोट मंडी का प्राइस चार्ट
मंडी में स्टॉकर्स और बड़े किसानों के लिए यह समय भारी मुनाफे का है, क्योंकि जिन्होंने अपनी फसल को रोक कर रखा था, उन्हें अब अपनी लागत का बेहतरीन रिटर्न मिल रहा है।
जिंस / सामग्री (Commodity Name)पुराना भाव (Old Price – Early May)नया भाव (Current Peak Price)प्रति यूनिट अंतर (Net Hike)सरसों (Mustard per Quintal)₹6,800₹7,500+ ₹700 प्रति क्विंटलसरसों तेल टीन (Oil per KG Bulk)₹168₹175+ ₹7 प्रति किलोखुदरा सरसों तेल (Retail Market)₹165₹180+ ₹15 प्रति किलोसरसों खल (Cattle Feed per Quintal)सामान्य स्तर₹300 की बढ़ोतरी+ ₹300 प्रति क्विंटल
बड़े स्टॉकर्स ने बाजार में उतारा माल
बढ़ते दामों को देखते हुए लालसोट मंडी में इन दिनों रौनक काफी बढ़ गई है। मंडी में प्रतिदिन करीब 5 हजार कट्टों (Bags) की नियमित आवक हो रही है और उतनी ही तेजी से उनकी बिकवाली भी की जा रही है।
जिन किसानों और बड़े स्टॉकर्स ने सीजन की शुरुआत में कम दामों के डर से अपनी फसल को नहीं बेचा था, वे अब ऊंचे दामों का फायदा उठाने के लिए अपना स्टॉक धीरे-धीरे बाजार में निकाल रहे हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यदि ईरान और इजरायल के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में खाद्य तेलों की कीमतें आम आदमी को और ज्यादा रुला सकती हैं।
आम आदमी की थाली से गायब हो रहा जायका
साफ है कि वैश्विक युद्ध सिर्फ मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी लड़ा जाता है। राजस्थान जहां सरसों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, वहां इस तेजी से किसानों को तो मुस्कुराने का मौका मिला है, लेकिन मिडिल क्लास और गरीब परिवारों की रसोई का बजट पूरी तरह चरमरा गया है। सरसों तेल की इस कड़वाहट को कम करने के लिए अब जनता की नजरें सरकार के हस्तक्षेप और महंगाई पर लगाम लगाने वाले कदमों पर टिकी हैं।