अजमेर। ऐतिहासिक स्थल ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला परिसर में हनुमान चालीसा पाठ की अनुमति मांगने से जुड़ा है। महाराणा प्रताप सेना के संस्थापक अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने जिला प्रशासन को आवेदन देकर संगठन के सदस्यों के साथ वहां हनुमान चालीसा पाठ करने की अनुमति मांगी है। इस आवेदन के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है और मामले में रिपोर्ट तलब की गई है।
महाराणा प्रताप सेना की ओर से जिला कलक्टर को दिए गए आवेदन में धार्मिक आस्था और संकल्प व्यक्त करने के उद्देश्य से ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ परिसर में हनुमान चालीसा पाठ आयोजित करने की अनुमति मांगी गई है। आवेदन में कहा गया कि संगठन के कार्यकर्ता धार्मिक कार्यक्रम के माध्यम से अपनी आस्था प्रकट करना चाहते हैं।
प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया
मामले को गंभीरता से लेते हुए अतिरिक्त जिला कलक्टर (शहर) ने पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग अजमेर से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। प्रशासन की ओर से चार महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्ट अभिमत मांगा गया है। इनमें कार्यक्रम की अनुमति दिए जाने संबंधी अभिशंसा, परिसर में पूर्व में ऐसे किसी आयोजन की जानकारी, किसी समुदाय विशेष में आक्रोश की संभावना और साम्प्रदायिक तनाव की आशंका को लेकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है।
एएसआई जाहिर की चिंता
इधर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) उपमंडल अजमेर ने प्राथमिक स्तर पर कार्यक्रम को लेकर चिंता व्यक्त की है। एएसआई के वरिष्ठ संरक्षण सहायक ने पत्र लिखकर बताया कि इस प्रकार के आयोजन से साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जोधपुर मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् से मार्गदर्शन भी मांगा गया है।
संस्कृत विद्यालय और हिंदू मंदिर का दावा
महाराणा प्रताप सेना के संस्थापक अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने अपने पत्र में दावा किया है कि ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ केवल एक ऐतिहासिक संरचना नहीं, बल्कि मूल रूप से ‘संस्कृत कंठाभरण विद्यालय और हिन्दू मंदिर’ रहा है। उन्होंने कहा कि इसके इतिहास और दीवारों पर उकेरे गए साक्ष्य इस दावे की पुष्टि करते हैं।
अजमेर दहगाह में भी हिंदू मंदिर का दावा
गौरतलब है कि अजमेर में धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों को लेकर पहले भी विवाद और कानूनी बहसें होती रही हैं। अजमेर दरगाह में मंदिर होने के दावे से जुड़े विचाराधीन न्यायिक प्रकरण में भी महाराणा प्रताप सेना और उसके संस्थापक अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार पक्षकार हैं। फिलहाल अब सभी की नजर प्रशासन और पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जिसके बाद आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।