संपादकीय: समाज की हकीकत बयान करते एनसीआरबी के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े समाज के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करने वाले होते हैं, जिनकी अनदेखी के परिणाम समाज को पतन की ओर धकेलने वाले हो सकते हैं। इन आंकड़ों से इसका भी संकेत मिलता है कि शासन-प्रशासन को किन क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है। हालांकि साल-दर-साल ये आंकड़े यही बताते हैं कि अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा। अपराध के आंकड़े, आम लोगों के लिए हैरान-परेशान करने वाले भी होते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि वास्तव में उनके आसपास चल क्या रहा है। एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट, जिसमें 2024 में हुए अपराधों के आंकड़े सामने आए हैं, फिर से हमें चिंता में डाल रहे हैं। इनके मुताबिक देश में प्रति 17 मिनट में किसी न किसी की हत्या, हर पांच मिनट में किसी न किसी का अपहरण और हर 18 मिनट में किसी न किसी से बलात्कार हो रहा है। धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध तो हर दो मिनट में हो रहे हैं। डिजिटल क्रांति के बाद तो साइबर अपराध की बाढ़ आ गई है और इन्हें नियंत्रित करने के उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं।

हैरानी की बात यह भी है कि शांत समझा जाने वाला राजस्थान महिलाओं के खिलाफ अपराध में लगातार छठे साल शीर्ष पर बना हुआ है। बलात्कार के मामले में यह पहले स्थान पर, जबरन गर्भपात में दूसरे और भ्रूण हत्या में तीसरे स्थान पर है। विवाह के लिए महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी राजस्थान चौथे नंबर पर है। इस अपराध में बिहार टॉप, यूपी दूसरे और पंजाब तीसरे स्थान पर है। बिहार ‘पकड़वा विवाह’ के लिए भी बदनाम है, जिसमें पुरुषों का अपहरण कर जबरन शादी कर दी जाती है। यदि प्रति लाख आबादी के लिहाज से हत्या की दर का विश्लेषण किया जाए तो झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य टॉप पर हैं और उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा और अपराधों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाला राज्य 12वें स्थान पर। इस मामले में मध्यप्रदेश छठे और राजस्थान सातवें पायदान पर खड़ा है।

हालांकि, इस बात से खुश हुआ जा सकता है कि इन आंकड़ों में 2023 की तुलना में कई तरह के संगीन अपराधों में कमी आई है। कुछ विशेषज्ञ इसकी वजह नई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होना बता रहे हैं, जिसमें संज्ञेय अपराधों की लिस्ट से कई अपराध हटा दिए गए हैं। आत्महत्या के मामलों में मामूली कमी भी संतोषजनक है पर विद्यार्थियों और बेरोजगारों की खुदकुशी के मामले बढ़ता रोजगार संकट, शिक्षा-कॅरियर और भविष्य के प्रति अनिश्चितता के माहौल के विस्तार का संकेत है। विश्लेषण से पता चलता है कि ‘स्ट्रीट क्राइम’ स्थिर हो रहे हैं, लेकिन ‘सॉफ्टवेयर क्राइम’ बेकाबू हो रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि सड़क पर रिस्क लेकर छोटे-मोटे अपराध करने वाले अब इंटरनेट पर ‘कमाई’ में जुट गए हैं। जाहिर है, पुलिस व्यवस्था को अब डंडे से ज्यादा डिजिटल फॉरेंसिक और डेटा एनालिटिक्स की जरूरत है।