नागौर. नागौर जिला मुख्यालय के सबसे बड़े जेएलएन राजकीय अस्पताल में पिछले 40 दिनों से सोनोग्राफी कक्ष पर ताला लटका है और जिम्मेदार सिस्टम मूकदर्शक बना बैठा है। मुख्यमंत्री नि:शुल्क जांच योजना के बड़े-बड़े दावों की पोल अब अस्पताल की बंद पड़ी मशीनें खोल रही हैं। हालत यह है कि रोजाना 60 से 70 मरीजों के सोनोग्राफी जांच लिखी जाती है, लेकिन सोनोलॉजिस्ट नहीं होने से उन्हें या तो निजी लैबों में सैकड़ों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं या फिर जांच के बिना ही लौटना पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सवा महीना बीत जाने के बाद भी अस्पताल प्रबंधन वैकल्पिक व्यवस्था तक नहीं कर पाया। गर्भवती महिलाओं, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों और ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब परिवारों की परेशानी लगातार बढ़ रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनहीनता खत्म होने का नाम नहीं ले रही। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का यह उदाहरण साफ बताता है कि योजनाएं कागजों में भले चमक रही हों, लेकिन जमीन पर मरीजों को राहत नहीं, केवल इंतजार और परेशानियां मिल रही हैं।
सीटी स्केन लम्बे समय से बंद
सोनोग्राफी की जांच जहां सोनोलोजिस्ट के अभाव में 40 दिन से बंद है, वहीं सीटी स्केन की जांच मशीन खराब होने के कारण लम्बे समय से बंद है। हालांकि जांच का ठेका निजी कम्पनी को दिया हुआ है, लेकिन मशीन सरकारी है, जो करीब 10-12 साल पुरानी होने के कारण बार-बार खराब हो रही थी और अब पिछले तीन-चार महीने से बंद पड़ी है। इसके बावजूद विभाग की ओर से नई मशीन की व्यवस्था नहीं की जा रही है।
सोनोग्राफी कक्ष के बाहर खड़े पिता-पुत्र
अस्पताल का प्रबंधन रामभरोसे
जेएलएन अस्तपाल का प्रबंधन इन दिनों रामभरोसे चल रहा है। गत दो मई को पीएमओ डॉ. आरके अग्रवाल की तबीयत खराब हो गई, इसलिए वे रेस्ट पर हैं, लेकिन पीछे पीएमओ का चार्ज किसी को नहीं दिया गया है। ऐसे में अस्पताल की व्यवस्थाएं संभालने वाला कोई नहीं है। एक डॉक्टर ने तो यहां कह दिया कि यहां सब पीएमओ है।
नि:शुल्क जांच का दावा थोथा
बेटे के पेशाब की तकलीफ होने पर डॉक्टर ने सोनोग्राफी की जांच लिखी, लेकिन यहां ताला लगा हुआ है। पांच दिन पहले आया तब भी ताला था और आज भी। सरकार का नि:शुल्क जांच का दावा थोथा साबित हो रहा है।
– करणाराम, रोहिणी