डॉ. अमन शर्मा प्रोफेसर एवं रिसर्च साइंटिस्ट– 2026बीजिंग ई-टाउन हाफ-मैराथन में जब अपना आखिरी धावक भी फिनिश लाइन पार कर लिया, तो दुनिया ने सिर्फ एक खेल आयोजन का अंत नहीं देखा, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर से लिखी गई एक नई वैश्विक चेतना का जन्म देखा। इस दौड़ में हर धावक के जूते, कपड़े और यहां तक कि पानी की बोतल तक सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) चिप्स से जुड़े थे, जो न सिर्फ हृदय की धड़कन और मांसपेशियों की थकान को माप रहे थे।सैकड़ों भाषाओं में दुनिया के कोने-कोने में बैठे दर्शकों तक यह संदेश पहुंचा रहे थे कि अब प्रतिस्पर्धा केवल समय और गति की नहीं, बल्कि सुरक्षा, समानता और मानवीय सहानुभूति की है। जब दौड़ समाप्त हुई, तो उसी एआइ ने पूरी दुनिया को एक डिजिटल दीवार पर यह लिखकर दिखा दिया कि तकनीक मनुष्य को मात देने के लिए नहीं, बल्कि उसे गिरने से बचाने, उसका हाथ थामने व उसे उसकी अपनी सीमाओं से परे ले जाने के लिए है।
एआइ से भरी इस दुनिया में सबसे बड़ी मैराथन अब यह है कि हम एक-दूसरे को समझें, एक-दूसरे की रक्षा करें और एक साथ दौड़ते रहें, भले ही हमारी भाषाएं, झंडे या शरीर अलग-अलग हों। 2026 बीजिंग ई-टाउन हाफ-मैराथन अब सिर्फ एक दौड़ की याद नहीं, बल्कि ऐसा एआइ-लिखित वैश्विक संदेश बन चुका है, जो यह साबित करेगा कि तकनीक तब शक्तिशाली होती है जब वह मानवता की सेवा करे। भारत को उसी प्रेरणा से आगे बढऩा होगा, जो 2026 बीजिंग ई-टाउन हाफ-मैराथन के एआइ संदेश ने दुनिया को दी- यानी तकनीक को केवल नकल या उपभोग तक सीमित न रखकर, उसे अपनी अनूठी समस्याओं और सपनों के अनुरूप ढालना होगा। भारत को चाहिए कि वह एआइ, ड्रोन, हेल्थ-सेंसर और डिजिटल भाषाई प्लेटफॉर्म को हर गांव और गली तक पहुंचाए। भारत को अपनी सांस्कृतिक विविधता, योग, अहिंसा और सामूहिक चेतना को एआइ में एम्बेड करना होगा। भारत को मुख्यधारा से आगे निकलकर एआइ युग में वैश्विक सुपरपावर बनने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने कुल एआइ प्रयासों का 35त्न हिस्सा सीधे ग्रामीण और गरीब जनता तक पहुंचाने में लगाए, जहां एआइ-आधारित टेलीमेडिसिन, दूरस्थ शिक्षा और सामाजिक सुधार के स्मार्ट मंच अंतिम छोर के व्यक्ति को भी सशक्त बना सकें। वहीं 20% प्रयास भारतीय भाषाओं (हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली, गुजराती आदि) में एआइ प्लेटफॉर्म विकसित करने में लगाना होगा। 15% संसाधन योग, ध्यान और समग्र कल्याण की आयुर्वेदिक व आध्यात्मिक परंपराओं को एआइ से जोडऩे में समर्पित करना होगा। 10% प्रयास ड्रोन, किफायती सेंसर और पहनने योग्य उपकरणों के पूर्णत: स्वदेशी निर्माण पर केंद्रित होने चाहिए। 10% हिस्सा वैश्विक एआइ नैतिकता, डेटा गवर्नेंस और एआइ कानूनों के ढांचे के नेतृत्व में निवेश करना होगा, ताकि भारत केवल तकनीकी उपभोक्ता न रहे, बल्कि नियमों के निर्माता के रूप में विश्व मंच पर छा जाए और अंतिम बचे हुए 10% प्रयासों को एआइ-संचालित उद्योगों, गहन तकनीकी स्टार्टअप्स, और अगली पीढ़ी की डिजिटल इकोसिस्टम के जरिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 8-10% की अतिरिक्त वार्षिक वृद्धि सुनिश्चित करने पर लगाना अनिवार्य होगा। क्योंकि जब तक आर्थिक लाभ दिखाई नहीं देगा, यह पूरा मॉडल टिकाऊ नहीं होगा। इस प्रकार के योजनाबद्ध, समावेशी और नैतिक एआइ निवेश से ही भारत न सिर्फ तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बन पाएगा, बल्कि ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करेगा, जहां एआइ गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य असमानता को मिटाने का बड़ा हथियार बन जाता है और फलस्वरूप भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बनकर उभरेगा।