कमलाकर सिंह, पूर्व कुलपति, मध्य प्रदेश भोज मुक्त विवि, भोपाल – वर्तमान समय में शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य और उसकी दिशा को लेकर व्यापक बहस चल रही है। विशेष रूप से वैदिक शिक्षा और गुरुकुल परंपरा की ओर पुन: ध्यान आकर्षित हो रहा है। यह केवल अतीत की स्मृतियों का पुनरावलोकन नहीं, बल्कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की सीमाओं, असंतुलनों और संभावित सुधारों पर गंभीर चिंतन का अवसर भी है। प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली मूलत: समग्र थी। वैदिक शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के बहुआयामी विकास की प्रक्रिया थी। इसमें ‘ब्रह्म’ के ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र और शास्त्र- दोनों का संतुलित समावेश था। अर्थात् बौद्धिक प्रखरता के साथ शारीरिक दक्षता, नैतिक मूल्यों के साथ आध्यात्मिक चेतना और व्यावहारिक जीवन-कौशल के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व सभी को समान महत्त्व दिया जाता था। गुरुकुल व्यवस्था इस समग्र शिक्षा का केंद्रबिंदु थी। शिक्षा पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, वह जीवन की प्रयोगशाला में विकसित होती थी। कृषि, पशुपालन, औषधीय वनस्पतियों का ज्ञान, जल-संरक्षण, खगोल और गणित- ये सभी विषय व्यावहारिक रूप में पढ़ाए जाते थे। इससे शिक्षा जीवन के साथ गहरे स्तर पर जुड़ी रहती थी।
गांधीजी ने भारतीय शिक्षा को एक ‘सुंदर वृक्ष’ की उपमा देते हुए कहा था कि अंग्रेजों ने उसकी जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे वह व्यवस्था धीरे-धीरे नष्ट हो गई। इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए धर्मपाल ने अपने शोधग्रंथ ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ में ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की शिक्षा व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया। उन्होंने यह स्थापित किया कि भारत में गांव-गांव तक शिक्षा का सुदृढ़ तंत्र विद्यमान था, जिसमें विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग शिक्षक और विद्यार्थी दोनों रूपों में सक्रिय थे, जिससे शिक्षा में समावेशिता और सामाजिक संतुलन बना रहता था। यह शिक्षा प्रणाली स्वाभाविक, सामाजिक और जीवन-सापेक्ष थी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की ओर देखें, तो इसमें समग्र शिक्षा की अवधारणा को पुनर्जीवित करने का प्रयास दिखाई देता है। के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में तैयार इस नीति में बहुविषयक अध्ययन, कौशल विकास, नैतिक शिक्षा और रचनात्मकता पर बल दिया गया है। यह एक सकारात्मक पहल है, किंतु इसके क्रियान्वयन में अब भी कई चुनौतियां हैं। विशेषकर वैदिक शिक्षा की गहराई- जिसमें जीवन और ज्ञान का अभिन्न संबंध था और टैगोर की वैश्विक मानवीय दृष्टि, इन दोनों को व्यवहार में उतारने के लिए अधिक ठोस, संरचनात्मक और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता है।
आज की शिक्षा प्रणाली में कई परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। विद्यालयों में प्रार्थना सभाएं, प्रभात फेरियां, राष्ट्रगीत एवं ‘वंदे मातरम्’ जैसे सामूहिक सांस्कृतिक उपक्रम धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। शिक्षा में मूल्यों का क्षरण भी एक गंभीर चिंता का विषय है। प्रतिस्पर्धा, अंक-केन्द्रितता और कॅरियर की दौड़ ने शिक्षा को एक सीमित दायरे में बांध दिया है। जबकि वैदिक शिक्षा में सत्य, अहिंसा, सेवा, संयम व सहअस्तित्व जैसे मूल्यों को जीवन का आधार माना जाता था। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि हम अतीत और वर्तमान के बीच संतुलन स्थापित करें। वैदिक शिक्षा की मूल भावना- समग्रता, प्रकृति संग जुड़ाव, मूल्य-आधारित जीवन और व्यावहारिक ज्ञान व टैगोर की मानवीय शिक्षा-दृष्टि, को आधुनिक शिक्षा में समाहित किया जाए। शिक्षा को केवल ‘सूचना’ देने का माध्यम नहीं, बल्कि ‘व्यक्तित्व निर्माण’ का साधन बनाना होगा। यदि हम शिक्षा को जीवन से जोडऩे में सफल होते हैं, तो न केवल सक्षम व्यक्ति का निर्माण होगा, बल्कि जागरूक, संवेदनशील व संतुलित समाज भी विकसित होगा।