संपादकीय: मिलावटखोरों पर रखनी होगी कड़ी नजर

गुजरात के साबरकांठा में दूध और छाछ की मिलावटी फैक्ट्री के भंडाफोड़ का हाल में जो खुलासा हुआ है, वह केवल आपराधिक घटना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। साथ ही देश में दुग्ध उत्पादकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की महत्ती आवश्यकता पर जोर देता है। देश का कोई राज्य, शहर, कस्बा और अब तो गांव भी नहीं छूटा है जहां यह समस्या सामने न आ रही हो। कहीं न कहीं से यह खबर होती है कि दूध, दही, छाछ, पनीर, मक्खन और मावे में कीटनाशकों, डिटर्जेंट, तेल और कई तरह के घातक रसायनों का इस्तेमाल होता मिला है। अपराध दूध में पानी की मिलावट करना भी होता है, पर अब स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि कृत्रिम दुग्ध उत्पाद बनाना और बेचना रोजमर्रा की बात हो गई है। यह सब कुछ छिटपुट स्तर पर नहीं हो रहा है, इसमें बड़े-बड़े रैकेट तक लिप्त हो चुके हैं।

भारत जैसे देश में दूध को संपूर्ण आहार माना जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों के लिए यह पोषण का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में यदि दूध के नाम पर डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा जैसे रसायन लोगों के शरीर में पहुंच रहे हों, तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं। लंबे समय तक ऐसे मिलावटी उत्पादों का सेवन किडनी, लीवर और पाचन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने खुद 70 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में खराबी पाई है। प्राधिकरण की इसी साल की ताजा रिपोर्ट में इसका उल्लेख है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सीलबंद और खुले दुग्ध उत्पादों के साथ यही स्थिति है। मिलावट का यह धंधा तब तक फलता-फूलता रहेगा, जब तक दंड का डर वास्तविक और प्रभावी नहीं होगा। खाद्य सुरक्षा कानूनों में सख्त प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनका कठोर और निरंतर पालन भी उतना ही जरूरी है। दोषियों को शीघ्र और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, ताकि स्पष्ट संदेश जाए कि लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इसके साथ ही उपभोक्ताओं की जागरूकता भी बेहद महत्वपूर्ण है। लोगों को दूध की गुणवत्ता की पहचान, विश्वसनीय स्रोतों से खरीद और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। सहकारी डेयरियों और संगठित क्षेत्र को भी अपनी आपूर्ति शृंखला की निगरानी मजबूत करनी होगी। साबरकांठा की यह घटना एक चेतावनी है कि खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। यदि हम सचेत नहीं हुए, तो सस्ता और अधिक मुनाफा कमाने की लालच में कुछ लोग हम तक जहर पहुंचाते रहेंगे। अब समय आ गया है कि मिलावट के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंसÓ की नीति को सख्ती से लागू किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि दूध, जो जीवन का प्रतीक माना जाता है, किसी के लिए मौत का कारण न बने।