Rajasthan Budget Expectations : राजस्थान विधानसभा में 11 फरवरी को आने वाले राज्य बजट से पहले ‘राजस्थान पत्रिका’ के 41 जिलों की ग्राउंड रिपोर्ट में यह साफ हुआ है कि प्रदेश की शहरी और ग्रामीण जनता आज भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है। पानी, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और पर्यावरण से जुड़ी इन समस्याओं के समाधान के लिए बजट में ठोस घोषणाएं जरूरी हैं। यदि इन पर बजट में ठोस घोषणाएं होती हैं, तो शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों की 8 करोड़ से अधिक आबादी को सीधा लाभ मिलेगा।
जयपुर में अनियंत्रित शहरीकरण का दर्द है, तो सरहदी बाड़मेर-जैसलमेर में पानी की प्यास। कहीं औद्योगिक धुएं से घुटता दम है, तो कहीं रोजगार की बाट जोहते युवाओं का पलायन। पत्रिका ने फीडबैक लिया तो हर जिले की एक अलग ‘जरूरत’ की गूंज सुनाई दी।
1- धौलपुर
उद्योग नहीं लगने से युवाओं को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है।
2- झुंझुनूं
लोहार्गल जैसे बड़े तीर्थ पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
3- हनुमानगढ़
मिनी सचिवालय नहीं बनने से आमजन परेशान।
4- बूंदी
सैंड स्टोन उद्योग संकट में है। इकाइयां बंद हो रही हैं।
5- उदयपुर
झीलों और हेरिटेज पर दबाव बढ़ रहा है।
6- बारां
राष्ट्रीय राजमार्ग शहर के बीच से गुजर रहा है। जाम और हादसे आम हो गए हैं।
7- राजसमंद
यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा है। एलीवेटेड रोड नहीं होने से जाम आम बात है।
8- चूरू
नहरी पानी नहीं मिलने से किसान लगातार संकट में हैं।
9- बालोतरा
देश का बड़ा पॉपलिन उद्योग होने के बावजूद आधारभूत सुविधाएं कमजोर हैं।
10- पाली
टेक्सटाइल उद्योग का अपशिष्ट जल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है।
11- बाड़मेर
सर्दियों में भी पानी का संकट बना रहता है।
धार्मिक पर्यटन बिखरा, विकास ठप
1- सवाईमाधोपुर
त्रिनेत्र गणेश मंदिर तक पहुंच जोखिममरी बनी हुई है। रोप-वे के लिए बजट नहीं मिला।
2- अलवर
सिलीसेढ़ योजना के लंबित रहने से शहर-गांवों में पानी की किल्लत।
3- बहरोड़-कोटपूतली
औद्योगिक क्षेत्र होने के बावजूद रिंग रोड नहीं होने से शहरों में भारी जाम लगता है।
4- करौली
हिण्डौन में ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने से हर बरसात में जलभराव और बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं।
5- डीग
बृज के तीर्थ स्थलों का विकास उप है। धार्मिक पर्यटन बिखरा हुआ है।
6- भरतपुर
पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद जिला उपेक्षित है।
7-खैरथल-तिजारा
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुए और धूल ने हवा को जहरीला बना दिया है। लोग दमा और फेफड़ों के गंभीर रोगों की चपेट में हैं। सुबह की सैर अब बीमारी बांटने वाली बन गई है।
खास उपजों को चाहिए उद्योगों का साथ
राजस्थान के खेतों में पैदा होने वाली फसलें प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। कोटा का धनिया हो या सवाई माधोपुर के मीठे अमरूद, बीकानेर की मूंगफली हो या जैसलमेर का जीरा। इन उपजों को स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट, कोल्ड स्टोरेज और बेहतर मार्केटिंग का साथ मिल जाए, तो राजस्थान ‘कृषि-बिजनेस’ के ग्लोबल हब के रूप में उभर सकता है।
अन्नदाता की मेहनत को उद्योगों का साथ मिलते ही न केवल किसानों की आय दोगुनी होगी, बल्कि करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार भी खुलेंगे। बारां में उच्च गुणवत्ता वाला लहसुन होता है। लेकिन यहां प्रोसेसिंग यूनिट नहीं है। भीलवाड़ा की मक्का का खाड़ी देशों तक निर्यात होता है। यहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट और एथनॉल प्लांट की मांग की जा रही है। चूरू की ग्वार की ग्वार की देश-विदेश में मांग है।
देखरेख नहीं, चंबल नदी में गिर रहा नालों को पानी
कोटा- चंबल नदी में लगातार नालों को पानी गिर रहा है।
नागौर- मिनी सचिवालय नहीं होने से कामकाज प्रभावित है।
दौसा- ईसरदा और बीसलपुर परियोजनाओं में देरी से शहर आज भी पानी के संकट से जूझ रहा है।
बीकानेर- धार्मिक स्थल बिखरे होने से पर्यटन को फायदा नहीं मिल पा रहा है।
सीकर- तेजी से बढ़ती आबादी के बावजूद नगर निगम का दर्जा नहीं मिला।
भीलवाड़ा- वाहनों की संख्या बढ़ने से शहर जाम में फंस रहा है।
प्रतापगढ़- मेडिकल कॉलेज की घोषणा अब तक कागजों में है।
चित्तौड़गढ़- पर्यटन स्थलों के बीच समन्वय नहीं है।
जैसलमेर- शहर और गांवों में पेयजल आपूर्ति अनिश्चित है।
सिरोही- जवाई बांध होते हुए भी कई गांव प्यासे हैं।
जालोर- शहर का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन सीवरेज अधूरी है।
झालावाड़- कृषि उपज के बावजूद प्रसंस्करण उद्योग नहीं हैं।
फलोदी- दुर्घटनाओं और मेलों के दबाव के बावजूद मेडिकल कॉलेज नहीं हैं।