चित्तौड़गढ़। निजी अपेक्षाओं और ताकत दिखाने की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस की गुटबाजी हावी है। हर नेता अपनी ढपली, अपना राग के माहौल में नजर आ रहा है। पूर्व मंत्री ने दम दिखाकर अपने समर्थक को जिला अध्यक्ष बनवाया तो कई पूर्व विधायक और अन्य नेता अध्यक्ष के दायरे से बाहर हो गए। इसी वजह से प्रदेश कार्यालय के निर्देश पर होने वाले आयोजनों में सरकार के खिलाफ उठने वाले विरोध के सुर भी एक नहीं हैं।
चित्तौड़ जिला कांग्रेस में दो प्रमुख गुट
गौरतलब है कि चित्तौड़ जिला कांग्रेस में दो प्रमुख गुट हैं। एक निम्बाहेड़ा से विधायक रहे पूर्व मंत्री उदयलाल आंजना का और दूसरा चित्तौड़ से विधायक रहे सुरेंद्र सिंह जाड़ावत का गुट है। वर्तमान में जिला कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद सिसौदिया आंजना गुट से होने के कारण जाड़ावत से उनकी पटरी नहीं बैठ रही है।
यही कारण है कि प्रदेश कांग्रेस के आदेश पर मनरेगा का नाम बदलने के विरोध में हुए आयोजन में गुटबाजी हावी रही। इस जिला स्तरीय विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम में बैगूं से विधायक रहे राजेंद्र सिंह बिधूड़ी के अलावा एक भी पूर्व विधायक शामिल नहीं हुआ। इतना ही नहीं, चित्तौड़ शहर में हुए इस विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस के शहर और ग्रामीण दोनों ब्लॉक अध्यक्ष भी शामिल नहीं हुए।
सिसोदिया से इनकी भी दूरी
जिला अध्यक्ष सिसोदिया के आंजना गुट से होने के कारण कांग्रेस में बड़ी दरार सामने आ रही है। सिसोदिया की न केवल जाड़ावत, बल्कि कपासन के पूर्व विधायक शंकरलाल बैरवा, बड़ी सादड़ी से पूर्व विधायक प्रकाश चौधरी और पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष भेरूलाल चौधरी जैसे कई वरिष्ठ नेताओं से भी पटरी नहीं बैठ रही है। ऐसे में आने वाले पंचायत और नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।