श्रीगंगानगर। बदलते समय में सोशल मीडिया और रील संस्कृति बच्चों और किशोरों पर गहरा असर डाल रही है। फिल्मी कलाकारों जैसा बनने की चाह और रील्स के प्रति बढ़ते आकर्षण के चलते कई बच्चे वास्तविक जीवन से दूरी बनाते जा रहे हैं। इसी वजह से वे अपने परिजनों से उन वस्तुओं की मांग करने लगते हैं, जो अक्सर परिवार की पहुंच से बाहर होती हैं। मांग पूरी न होने पर कुछ बच्चे घर छोड़कर चले जाते हैं।
बाल कल्याण समिति ने जिले में लापता मिले 15 बच्चों को उनके परिवारों से मिलाने में अहम भूमिका निभाई है। इनमें 10 लड़के और 5 लड़कियां शामिल हैं। समिति के अध्यक्ष जोगेन्द्र कौशिक ने बताया कि काउंसलिंग में यह बात सामने आई है कि लड़कियां नया मोबाइल और लड़के नई बाइक की जिद में घर छोड़ देते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले चार वर्षों में बच्चों पर सोशल मीडिया और रील्स का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिससे कई बार वे घर-परिवार से दूरी बना लेते हैं।
बिहार से बच्चों के आने का सिलसिला
ज्यादातर बरामद बच्चे बिहार क्षेत्र के पाए गए, जिन्हें कुछ लोग आजादी और बेहतर जीवन का सपना दिखाकर बहला-फुसलाकर अपने साथ ले आते हैं और बाल श्रमिक के रूप में काम करवाते हैं। इनमें कुछ बच्चे दुकानों और मकानों में झाड़ू-पोछा करते मिले, जबकि कुछ ढाबों पर जूठे बर्तन साफ करते हुए और कुछ सब्जी की रेहड़ियों पर हेल्पर के रूप में काम करते पाए गए। समिति के अनुसार रेस्क्यू के दौरान कई बार लोग खुद को रिश्तेदार बताकर बच्चों को वापस ले जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जांच के बाद ही उन्हें वास्तविक परिजनों को सौंपा जाता है।
एसीआरबी रिपोर्ट: प्रदेश में 7,198 बच्चे लापता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 7,198 बच्चे लापता दर्ज किए गए, जिनमें 84 प्रतिशत से अधिक नाबालिग लड़कियां हैं। बच्चों के लापता मामलों में राज्य देश में चौथे स्थान पर रहा। रिपोर्ट के अनुसार 1,226 बच्चे अब तक बरामद नहीं हुए हैं, जबकि 1,399 बच्चे एक वर्ष से अधिक समय से लापता हैं। राज्य में 39,384 वयस्क भी लापता दर्ज किए गए हैं। मानव तस्करी के 75 मामलों में 333 पीड़ितों को मुक्त कराया गया, जबकि राजस्थान में कुल 9,083 अपहरण के मामले भी दर्ज हुए, जिनमें अधिकतर पीड़ित नाबालिग थे। पुलिस के अनुसार एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स सक्रिय हैं और जांच व जागरूकता अभियान जारी हैं।
मां की आंखों में आज भी बेटे की वापसी का इंतजार
मां अपने बच्चे का दर्द सबसे बेहतर समझती है। अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस पर पुरानी आबादी वार्ड नंबर 16 निवासी ममता सोनी की कहानी हर किसी को भावुक कर देती है। उनका साढे पंद्रह वर्षीय बेटा नितिन सिंह उर्फ गुरु पिछले तीन वर्षों से लापता है, लेकिन मां की उम्मीद आज भी जिंदा है। वह हर दिन घर की चौखट पर बेटे के लौटने का इंतजार करती हैं। ममता ने बताया कि पति की मौत के बाद उन्होंने मजदूरी कर अपने दोनों बेटों का पालन-पोषण किया।
बड़ा बेटा गुरु दोस्तों के साथ अधिक समय बिताने लगा तो उन्होंने उसे डांट दिया। किशोरावस्था के गुस्से में 7 जुलाई 2023 की वह घर से निकल गया और फिर वापस नहीं लौटा। वो दिन बाद परिजनों ने पुरानी आबादी थाने में गुमशुदगी दर्ज करवाई। ममता बेटे की तलाश में थाने से लेकर एसपी और आईजी कार्यालय तक कई बार गुहार लगा चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई सुराग नहीं मिला। बेटे के गुम होने के बाद उन्होंने छोटे बेटे नवजोत को सादुलशहर स्थित ननिहाल भेज दिया। ममता की बस एक ही पुकार है “मेरा गुरु वापस आ जाए।”