Barmer Giral Lignite Mines Protest: बाड़मेर: गिरल लिग्नाइट माइंस के बाहर पिछले डेढ़ महीने से जारी मजदूरों और ट्रक चालकों का आंदोलन अब केवल श्रमिकों की मांगों तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि यह मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक रंग भी लेता नजर आ रहा है। धरने को 45 दिन पूरे हो चुके हैं। शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी भी करीब 20 दिन से आंदोलन स्थल बैठे हैं।
बता दें कि चार दिन पहले जिला कलेक्ट्रेट पर हुए उग्र प्रदर्शन और प्रशासन के साथ चार घंटे चली वार्ता के बाद भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। प्रशासन आश्वासन दे रहा है, ठेकेदार कुछ मांगें मानने की बात कह रहा है। इधर, श्रमिक और प्रतिनिधिमंडल पूरी मांगें मनवाने पर अड़े हैं।
सवाल खड़ा हो रहा है कि प्रदेश सरकार अब तक कोई निर्णायक वार्ता क्यों नहीं कर पाई? इस मामले में भाजपा नेताओं का कहना है कि वे कई बार बातचीत के लिए आगे आए, लेकिन आंदोलनकारी पक्ष वार्ता के लिए नहीं पहुंचा।
आखिर अटका कहां है मामला?
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में नए टेंडर के बाद स्थानीय मजदूरों और चालकों को हटाए जाने का विरोध, आठ घंटे ड्यूटी, नियमानुसार वेतन और स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता शामिल है। श्रमिकों का आरोप है कि ठेकेदार कंपनी उनकी वाजिब मांगों को मानने को तैयार नहीं है।
वहीं, ठेकेदार कंपनी का पक्ष इससे अलग है। कंपनी का कहना है कि श्रमिकों को निकाला नहीं गया, बल्कि वे खुद काम छोड़कर धरने पर बैठ गए। कंपनी वाजिब मांगों पर सहमत है, लेकिन अनुचित मांगों के दबाव में निर्णय नहीं लिया जा सकता।
बातचीत के लिए आंदोलनकारी आगे नहीं आए
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष स्वरूप सिंह खारा ने कहा कि उन्होंने कई बार श्रमिक प्रतिनिधियों, प्रशासन और ठेकेदार से बातचीत की। उनके अनुसार अधिकतर मांगों पर सहमति बन रही थी, लेकिन आंदोलनकारी पक्ष बातचीत के लिए आगे नहीं आया। उन्होंने कहा कि सरकार श्रमिकों के साथ है, यह लोग मेरे अपने हैं, इनके लिए हम काम करेंगे, पहले भी किए हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहेंगे।
ठेकेदार का तर्क: वाजिब मांगें मानेंगे, दबाव नहीं
श्री मोहनगढ़ कंस्ट्रक्शन कंपनी के प्रतिनिधि मनोहर सिंह पाबड़ा का कहना है कि कंपनी श्रमिकों की उचित मांगों को मानने के लिए तैयार हैं। लेकिन बिना लाइसेंस वाहन संचालन या नियमों से बाहर की मांगों पर सहमति संभव नहीं है। उनका कहना है कि कर्मचारियों को उनकी स्किल के अनुसार वेतन दिया जा रहा है और आंदोलन के जरिए अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है।
आंदोलनकारी बोले- समझौते से मुकर गया ठेकेदार
आंदोलनकारी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य वीर सिंह थूबली का आरोप है कि पहले प्रशासन की मौजूदगी में समझौता हुआ था, लेकिन बाद में ठेकेदार पीछे हट गया। उनका कहना है कि श्रमिक केवल नियमों के अनुरूप काम और वेतन की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन गंभीरता नहीं दिखा रहे।
प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
प्रशासन का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच वार्ता जारी है, जल्द समाधान की उम्मीद है। हालांकि, लंबा खिंचता आंदोलन प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर रहा है। शिव उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया था। आखिर उस कमेटी ने अब तक क्या किया। उसके प्रयास धरातल पर नजर नहीं आ रहे।
समाधान की उम्मीद
दोनों पक्षों के बीच वार्ता जारी है और कमेटी बनाई गई है। जल्द सकारात्मक समाधान की उम्मीद है।
-चिन्मयी गोपाल, जिला कलक्टर
यह राजनीति नहीं, मजदूरों की लड़ाई
मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और आखिरी दम तक संघर्ष करेंगे। आंदोलन में हर दल के लोग शामिल हैं और इसे राजनीति से जोड़ना गलत है। यदि भाजपा सरकार पहले ही श्रमिकों की सुनवाई कर लेती तो उन्हें धरने पर बैठने की जरूरत नहीं पड़ती।
-रविंद्र सिंह भाटी, विधायक