जयपुर। प्रदेश में नर्सिंग शिक्षा को लेकर एक बार फिर निजी संस्थान और राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज आमने-सामने हैं। निजी नर्सिंग कॉलेज संचालकों ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय की ओर से अचानक नए नियम और प्रक्रियाएं लागू किए जाने से संस्थानों पर अनावश्यक प्रशासनिक और आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। सबसे ज्यादा विरोध भू-उपयोग परिवर्तन और अतिरिक्त जमीन की नई शर्तों को लेकर सामने आया है। संचालकों का कहना है कि इससे शिक्षा व्यवस्था से ज्यादा फाइलों और अनुमति प्रक्रियाओं का दायरा बढ़ेगा, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की आशंका है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर राजस्थान प्राइवेट नर्सिंग इंस्टीट्यूशन्स फेडरेशन के बैनर तले राजस्थान के करीब 200 निजी नर्सिंग संस्थानों के संचालक और 300 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने विवि के कुलगुरु डॉ. प्रमोद येवले के साथ बैठक कर 11 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। बैठक में रजिस्ट्रार हरफूल पंकज, उप कुलपति डॉ. सुधांशु कक्कड़, परीक्षा नियंत्रक अनिल काजला सहित विवि के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। संचालकों ने सरकार और संबंधित विभाग से मांग की कि पहले से संचालित संस्थानों को राहत देते हुए पुराने मानकों के आधार पर ही मान्यता और संबद्धता दी जाए, ताकि विद्यार्थियों और संस्थानों दोनों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
प्रवेश प्रक्रिया पर संकट !
बैठक में सबसे प्रमुख मुद्दा भारतीय नर्सिंग परिषद (आइएनसी) के मानकों के अनुसार बिल्ट-अप एरिया पूरा करने वाले संस्थानों पर अतिरिक्त इंस्टीट्यूशनल लैंड की बाध्यता नहीं थोपी जाने का उठा। संचालकों का तर्क था कि पहले से संचालित संस्थानों पर अचानक नई शर्तें लागू करने से कई कॉलेजों की संबद्धता और प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
निजी और सरकारी में समान हो नियम
फेडरेशन ने क्लिनिकल ट्रेनिंग के लिए अस्पताल संबद्धता में डुप्लीकेट एफिलिएशन रोकने, छात्र-रोगी अनुपात तय करने, फैकल्टी की कमी को देखते हुए एमएससी नर्सिंग शिक्षकों में राहत देने और निरीक्षण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की भी मांग उठाई।
प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि अचानक निरीक्षण और कम समय में कमी पूरी करने के आदेश संस्थानों के लिए परेशानी खड़ी करते हैं। बैठक में ई-लाइब्रेरी शुल्क, एफएमएस पोर्टल की तकनीकी खामियां, 18 प्रतिशत जीएसटी और काउंसलिंग के बाद रिक्त सीटों पर कॉलेज स्तर पर प्रवेश की अनुमति जैसे मुद्दे भी उठाए गए। फेडरेशन पदाधिकारियों ने कहा कि निजी और सरकारी नर्सिंग संस्थानों के लिए समान नियम लागू होने चाहिए।