जयपुर के 6 गांवों के किसानों को बड़ी राहत…350 बीघा जमीन की Land Pooling Scheme पर हाईकोर्ट की रोक

Jaipur Land Pooling Scheme Stay: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार व जयपुर विकास प्राधिकरण से पूछा है कि क्यों न लैंड पूलिंग स्कीम एक्ट-2016 व उसके तहत जयपुर जिले के 6 गांवों की करीब 350 बीघा भूमि पर विकसित की जा रही दो योजनाओं को रद्द कर दिया जाए? साथ ही इन दोनों योजनाओं की आगामी प्रक्रिया व जमीन पर कब्जा लेने पर रोक लगा दी। अब 27 मई को सुनवाई होगी।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा व न्यायाधीश शुभा मेहता की खंडपीठ ने कानाराम मीना व 25 अन्य की याचिका पर यह अंतरिम आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पल्लवी महेता ने कोर्ट को बताया कि लैंड पूलिंग स्कीम एक्ट 2016 को जून 2018 में लागू किया गया, जिसके अंतर्गत 2024 में करीब 350 बीघा भूमि लैंड पूलिंग के लिए लेने की प्रक्रिया शुरू की गई।

इन गांवों की जमीन शामिल

इसमें जयपुर में टोंक रोड स्थित शिवदासपुरा, चंदलाई व बरखेड़ा गांव एवं डिग्गी-मालपुरा रोड़ पर अचरावाला, जयसिंपुरा उर्फ तेजावाला व अभयपुरा गांव की भूमि शामिल है। यह कानून केंद्र के अवाप्ति संबंधी कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में कहा कि इस कानून में योजना विकसित करने के लिए स्थानीय प्राधिकरण या अन्य एजेंसी को ही अधिकार दिया गया है। काश्तकार को कोई अधिकार नहीं दिया।

याचिकाकर्ता ने यह लगाया आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि इन गांवों की करीब 350 बीघा भूमि को लिया जा रहा है, जो अवाप्ति की तरह है। इसमें जमीन का मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा। काश्तकारों को जमीन दी जाएगी लेकिन काश्तकार को तो जमीन भी नहीं दी जाएगी, जिसकी 112.5 वर्ग मीटर से कम है।

काश्तकार की जमीन उसकी सहमति बिना ले ली जाएगी। इसके अलावा काश्तकार को जो विकसित जमीन दी जाएगी, उसके चार्ज भी लिए जाएंगे। दूसरे राज्यों में काश्तकार की सहमति से जमीन लेने का प्रावधान है। इस भूमि पर कई फसलें हो रही है। ऐसे में कानून व योजना को रद्द किया जाए। इस पर कोर्ट ने लैंड पूलिंग की कार्रवाई व जमीन पर कब्जा लेने पर रोक लगा दी।

यह है लैंड पूलिंग स्कीम

लैंड पूलिंग स्कीम एक्ट-2016 जून 2018 में लागू किया गया था। इसमें कई जमीन मालिक अपनी-अपनी जमीन पूल करके सरकार या विकास प्राधिकरण, स्थानीय निकाय को देते हैं, ताकि क्षेत्र का योजनाबद्ध विकास किया जा सके। इसमें 55% तक विकसित जमीन लौटाने का प्रावधान है, जबकि 35-40% हिस्से में आधारभूत इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है। बाकी जमीन को संबंधित एजेंसी बेचकर विकास कार्यों का खर्च निकालती है।