दिनेश कुमार शर्मा
अजमेर (Ajmernews) . भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति और इतिहास की वाहक भी होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति संपूर्ण जीवन किसी भाषा के संरक्षण और विकास के लिए समर्पित कर दे तो वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद् डॉ. कमला गोकलानी ऐसी ही शख्सियत हैं, जिन्होंने सिंधी भाषा के शोध, लेखन और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर कार्य किया। आज 76 वर्ष की आयु में भी उनकी ‘साहित्यसाधना’ जारी है। उन्होंने लगभग 67 पुस्तकों का लेखन, अनुवाद और संपादन किया है। इनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह तथा शोध आलेखों के कई संकलन शामिल हैं।
सिंधी भाषा अत्यंत समृद्ध
वे कहती हैं कि सिंधी भाषा प्राचीन और अत्यंत समृद्ध है। वैदिक काल में भी इसका अस्तित्व रहा है और ऋग्वेद में ‘सिंध’ का कई बार जिक्र है। सिंधी की अरेबिक लिपि में 52 अक्षर होते हैं। फारसी तथा अरबी से कई अक्षरों के समावेश के कारण इसका शब्दकोष विशाल है।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
डॉ. गोकलानी ने स्कूल शिक्षा विभाग में हिंदी व्याख्याता के रूप में कॅरियर की शुरुआत की और बाद में कॉलेज शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2010 में राजकीय महाविद्यालय से एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे मदस विश्वविद्यालय अजमेर में सिंधु शोध पीठ में बतौर उप निदेशक सेवाएं दे चुकी हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर मिले सम्मान
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में वे 150 से अधिक शोध आलेख प्रस्तुत कर चुकी हैं। उनके 15 से अधिक शोध आलेख संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें वर्ष 2022 में राष्ट्रीय स्तर पर आजीवन साहित्य सेवा सम्मान प्रदान किया गया, वहीं राजस्थान सिंधी अकादमी का सर्वोच्च ‘सामीअवार्ड’ भी उन्हें मिल चुका है। नेहरू नगर में सांई बाबा मंदिर के पास रहने वाली डॉ. गोकलानी आज भी सिंधी भाषा के संवर्धन के लिए सक्रिय हैं।
शिक्षा
उनकी प्रारंभिक शिक्षा खारीकुई प्राइमरी स्कूल से हुई। इसके बाद कक्षा 10 राजेन्द्र स्कूल व कक्षा 11 आदर्श सीनियर सैकंडरी स्कूल से पास की। उन्होंने राजकीय महाविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। वर्ष 1994 में सिंधी साहित्य में पीएचडी की। ऐसा करने वाली वे देश की पहली महिला बनीं।
सेवाकाल
दिसंबर 1967 में स्कूल शिक्षा विभाग में हिंदी व्याख्याता के रूप में नियुक्ति के बाद उनकी पहली पोस्टिंग टोंक जिले के टोडारायसिंह में हुई। उन्होंने सितंबर 1994 तक स्कूल शिक्षा विभाग में सेवाएं दी। इसके बाद आरपीएससी के माध्यम से राजकीय महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुईं। वर्ष 2010 में जीसीए से एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुईं। वे मदस विश्वविद्यालय अजमेर में सिंधु शोध पीठ की उप निदेशक भी रहीं।
प्रमुख उपलब्धियां
उन्होंने 150 से अधिक सेमिनारों में शोध आलेख प्रस्तुत किए। उनके 15 से अधिक शोध आलेख संकलन प्रकाशित हुए। साथ ही 15 से अधिक शैक्षिक संस्थानों में विषय विशेषज्ञ के रूप में योगदान दिया। भारत सरकार के साहित्य अकादमी प्रोजेक्ट के तहत कई पुस्तकों का अनुवाद किया। पाकिस्तान के सात विश्वविद्यालयों में सिंधी विषय है। इनमें से 4 में वे विषय विशेषज्ञ हैं। तीन विश्वविद्यालयों की शोध पत्रिकाओं के संपादक मंडल में हैं।
पारिवारिक जीवन
वर्ष 1975 में चंदर गोकलानी से विवाह हुआ। वे 2010 में सीनियर अकाउंट ऑफिसर पद से सेवानिवृत्त हुए। उनके पुत्र भरत गोकलानी पॉलिटेक्निक कॉलेज में कार्यरत हैं, जबकि दूसरे पुत्र जयप्रकाश होटल व्यवसायी हैं।