डॉ. मिलिंद कुमार शर्मा – प्रोफेसर (एमबीएम यूनिवर्सिटी, जोधपुर),
इक्कीसवीं सदी में वैश्विक शक्ति संतुलन का स्वरूप तीव्रता से परिवर्तित हो रहा है, जहां भू-राजनीति का केंद्र सैन्य गठबंधनों के इतर रणनीतिक संसाधनों, उन्नत प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति-शृंखलाओं पर नियंत्रण की ओर स्थानांतरित हो गया है। वर्तमान में ‘पैक्स सिलिका’ को निसंदेह एक महत्वपूर्ण अमरीकी कदम के रूप में देखा जा सकता है, जो सिलिका, सेमीकंडक्टर और अन्य महत्वपूर्ण-दुर्लभ खनिजों पर आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं आपूर्ति-शृंखलाओं को पुनर्परिभाषित करना चाहता है। पैक्स सिलिका एक अमरीका-नेतृत्व वाला गठबंधन है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टरों और एआइ प्रौद्योगिकियों के लिए सुरक्षित व लचीली आपूर्ति-शृंखलाओं का निर्माण करना है। हाल में भारत को भी इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। भारत के लिए यह एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम मात्र नहीं है, अपितु अपने आर्थिक विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने का एक संभावित अवसर भी हो सकता है।
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सिलिका और उससे जुड़े दुर्लभ खनिज आज भारत की विकास यात्रा के केंद्र में हैं। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा आधुनिकीकरण जैसे कार्यक्रम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेमीकंडक्टर और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर हैं। अब तक भारत कमोबेश इन क्षेत्रों में आयात पर ही निर्भर रहा है, जिससे आपूर्ति-शृंखला में किसी भी प्रकार के व्यवधान की स्थिति में उसकी आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होने की प्रबल संभावना है। ‘पैक्स सिलिका’ की अमरीकी पहल इस संदर्भ में भारत को वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में एक वैकल्पिक और विश्वसनीय केंद्र के रूप में उभरने का अवसर प्रदान कर सकती है। कुछ दिनों पूर्व हुआ भारत-अमरीकी समझौता इस बात का प्रमाण है कि द्विपक्षीय संबधों में प्रारंभिक कठिनाइयों के बाद भी भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों और उभरती प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित चर्चाओं में भारत की भागीदारी यह संकेत देती है कि अमरीका सहित यूरोपियन राष्ट्र भारत को केवल एक बाजार नहीं, अपितु एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में देख रहे हैं। भारत-अमरीका तकनीकी सहयोग और निवेश संभावनाएं ‘पैक्स सिलिका’ के ढांचे को भारत-केंद्रित आर्थिक लाभ में बदल सकती हैं, यदि भारत अपनी घरेलू नीतियों, बुनियादी ढांचे और कौशल विकास पर उचित ध्यान दे। चीन-केंद्रित प्रतिस्पर्धा भारत के दृष्टिकोण से ‘पैक्स सिलिका’ को और अधिक प्रासंगिक बना देती है।
निसंदेह चीन का सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति-शृंखलाओं में प्रभुत्व भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय रहा है। बिना किसी प्रत्यक्ष टकराव की नीति अपनाए ‘पैक्स सिलिका’ भारत को इस अत्यधिक निर्भरता से धीरे-धीरे बाहर निकलने का अवसर प्रदान कर सकती है। इस पहल के माध्यम से भारत आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप दिशा दे सकता है। कुछ दिनों पहले अमरीका में महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों को लेकर हुए विदेश मंत्रियों का सम्मेलन भी इसी ओर संकेत दे रहा है। किंतु भारत के लिए यह भी आवश्यक है कि वह ‘पैक्स सिलिका’ में भागीदारी को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की सीमाओं में रखे। भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से स्वायत्त, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और परस्पर संतुलन पर आधारित रही है।
भारत ‘पैक्स सिलिका’ को किसी सैन्य या कठोर भू-राजनीतिक गठबंधन के रूप में न देखकर, अपितु इसे आर्थिक और तकनीकी सहयोग के मंच के रूप में उपयोग कर सकता है। इस संतुलित दृष्टिकोण से भारत न केवल अमरीका के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ कर सकता है, अपितु अन्य वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी रणनीतिक संवाद बनाए रख सकता है। साथ ही विश्व के दूसरे राष्ट्र ‘पैक्स सिलिका’ के आलोक में भारत की ओर ‘चाइना प्लस वन’ के विकल्प के रूप में भी देख सकते हैं। भारत-केंद्रित दृष्टिकोण से ‘पैक्स सिलिका’ का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू घरेलू क्षमता निर्माण भी है। यदि भारत केवल कच्चे खनिजों या सस्ते श्रम की आपूर्ति तक सीमित रहता है, तो इस पहल से दीर्घकालिक लाभ नहीं ले पाएगा। भारत को सेमीकंडक्टर डिजाइन, विनिर्माण, अनुसंधान और नवाचार के पूरे मूल्य-शृंखला में अपनी सक्रिय उपस्थिति सिद्ध करनी होगी। निसंदेह इसके लिए शिक्षा, कौशल विकास, अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य होगी।
‘पैक्स सिलिका’ को एक ऐसे अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, जो भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता, आर्थिक विकास और वैश्विक रणनीतिक भूमिका को सुदृढ़ कर सकता है। साथ ही यह पहल भारत को चीन-केंद्रित आपूर्ति-शृंखलाओं से संतुलित दूरी बनाने, अमरीका और अन्य साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपने स्वतंत्र मत को सुदृढ़ करने का भी अवसर प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ-साथ भारत अपने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन के अंतर्गत खोज, खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण क्षमताओं को विकसित करने में सक्षम बन सकता है। दुर्लभ खनिजों पर यह सहयोग मात्र व्यापार तक सीमित नहीं है, अपितु यह लोकतांत्रिक और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने से भी जुड़ा विषय है। यदि भारत विवेकपूर्ण कूटनीति, घरेलू सुधारों और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ इस पहल में भागीदारी करता है, तो ‘पैक्स सिलिका’ भारत के लिए केवल एक अमरीकी पहल मात्र न बनकर उसकी अपनी विकास और रणनीतिक कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय रच सकती है।