जैसाण की आबोहवा में घुलता नशा, गांव व शहर दोनों को जकड़ रहा

नशा शोर मचाकर नहीं आता, यह मोबाइल की एक चैट में आता है। यह समूह में बैठने के दौरान बस..एक बार ट्राय कर.. जैसे मासूम से दिखने वाले वाक्य में आकर पूरी जिंदगी पर कब्जा कर लेता है। जैसलमेर में एमडी ड्रग्स मौजूदा समय में तेजी से फैलता नशा है। न केवल शहर की सूनी गलियों व मार्गों बल्कि गांवों के युवाओं को भी अपने चंगुल में ले रहा है। धीरे-धीरे सिंथेटिक ड्रग्स शहर के युवाओं में अपनी जड़ें जमा रहा है। एमडी सीधे दिमाग पर हमला करता है- तेज व घातक तरीके से। जानकारों के अनुसार एमडी का असर बेहद तीव्रता से होता है। पहली खुराक में व्यक्ति को असामान्य ऊर्जा, आत्मविश्वास और खुशी का झूठा अहसास होता है। यही अनुभूति उसे दूसरी, तीसरी और फिर लगातार खुराक की ओर धकेल देता है। कुछ ही समय में यह नशा जरूरत बन जाता है और जरूरत लत में बदल जाती है।

शरीर पर यूं असर करता है एमडी

-एमडी मस्तिष्क को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाता है।
-नींद, भूख और डर जैसी प्राकृतिक संवेदनाएं खत्म होने लगती हैं।

-हिंसक व्यवहार, भ्रम और आत्महत्या का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
-ओवरडोज की स्थिति में तत्काल मौत की आशंका रहती है।

खो जाता है मानसिक व भावनात्मक नियंत्रण

एमडी का नशा अब किसी एक वर्ग या इलाके तक सीमित नहीं रहा। जो पहले शहरों की पार्टियों तक सिमटा था, वह अब गांवों की गलियों और खेतों तक पहुंच चुका है। मनोचिकित्सक डॉ. रामसिंह के अनुसार एमडी लेने वाला व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि वह कब मानसिक और भावनात्मक नियंत्रण खो चुका है।

यूं बना रहा युवाओं को तलबगार

-सोशल मीडिया और निजी चैट के जरिए ऑर्डर,

डिजिटल पेमेंट से बिना पहचान लेन-देन।
-सूने मकान या कम आवाजाही वाले रास्तों में छोटे पैकेट, आसानी से छिपा सकने वाली पुडिय़ा की आपूर्ति।
-कार्रवाई के बावजूद नेटवर्क टूटता नहीं, बल्कि नए रास्तों से फिर खड़ा हो जाता है।
…इसलिए युवा बन रहे आसान शिकार
-बेरोजगारी और खाली समय

-सोशल मीडिया का नकली ग्लैमर
-मानसिक तनाव, असफलता और अकेलापन

-परिवार और समाज की अनदेखी

हकीकत: हो रही कार्रवाई, फिर भी डिमांड

पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है। छापे पड़ रहे हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं, माल जब्त हो रहा है। बावजूद इसके गुपचुप तरीके से नशा मिल रहा है। कारण साफ है डिमांड अब भी जिंदा है। गिरफ्तारी के बाद तुरंत नए सप्लायर सक्रिय हो जाते हैं। उधर, परिवारजन भी डर और बदनामी के कारण परिवार शिकायत नहीं करते।