राजस्थान के इस शहर आज भी होती है भैंसों की लड़ाई…पढ़े क्या है परंपरा

रेलमगरा. उपखण्ड के गिलूण्ड कस्बा स्थित एतिहासिक माणक चौक में खेंखरे के अवसर पर प्राचीन समय से चली आ रही भैंसा क्रीड़ा की परंपरा का निर्वहन किया गया। परंपरा को लेकर माणक चौक में अपरान्ह तीन बजे से कस्बे सहित आसपास के गांवों से ग्रामीणों की भीड़ पहुंचना शुरू हो गई। शाम साढे चार बजे तक चौक के चारों ओर बनी छते ग्रामीणों की भीड़ से अट गई वहीं चौक में भी तिल धरने तक को जगह नहीं बची।

भैैंसों की रोमांचक क्रीडा के दर्शकों ने सराहा

हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ ने करीब पौन घंटे तक सामूहिक आतिशबाजी करते हुए दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। शाम करीब सवा पांच बजे भैंसों की पहली जोड़ी को मैदान में लाया गया। इसी दौरान चौक के चारों ओर ढोल के वादन के साथ भैंसों की पूजा करते हुए पशु पालकों का स्वागत किया गया। बाद में भैंसों की जोड़ी को क्रीड़ा करने के लिए चौक में छोड़ा गया। इस जोड़ी के भैंसे मैदान में दस मिनट तक डटे रहे, लेकिन कुछ खास करतब नहीं दिखाया। करीब दस मिनट तक चली आतिशबाजी के बाद दूसरी जोड़ी के भैंसों को लाया गया। इस जोड़ी के भैंसों ने खूब क्रीड़ा की, जिससे चौक में खड़े ग्रामीणों की भीड़ चौक छोडकऱ भागने को विवश हो गई। इस जोड़ी के भैंसों ने भी करीब दस मिनट तक चौक में अपनी उपस्थिति देकर दर्शकों को रोमांचित किया। तीसरी जोड़ी के भैंसे चौक में पहुंचे, लेकिन कुछ खास करतब नहीं दिखा पाए और कुछ देर चौक में रूकने के बाद निकल गए। चौथी जोड़ी के भैंसों ने एक-दूसरे को देखते ही ऐसा कमाल किया कि दर्शक चकित रह गए। पांचवीं और छठी जोड़ी के भैंसे चौक में पहुंचे और कुछ देर तक रोमांचक क्रीड़ा के बाद लौट गए।

अगले वर्ष अच्छी बारिश का अनुमान

गिलूण्ड में भैंसा क्रीड़ा की परंपरा को अगले वर्ष में मानसून की स्थिति के रूप में देखा जाता है। चौक में पहुंचने वाली विभिन्न जोड़ी के भैंसों के मध्य होने वाली क्रीड़ा मानसून के विभिन्न चरणों की स्थिति को दर्शाता है। इस बार दूसरी ओर चौथी जोड़ी के मध्य हुई क्रीड़ा को देखते हुए अगले वर्ष मानसून का मध्य चरण अच्छा रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।

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