खाकी का सिस्टम अब भी लाचार, शिक्षा के साथ तकनीकी दौड़ में फिसड्डी कर रहे मामलों की जांच

नागौर. नए कानून के तहत काम करना पुलिस के लिए मुश्किल बना हुआ है। अनुसंधान के बढ़े काम के साथ तकनीकी दावपेंच ने आईओ (अनुसंधान अधिकारी) को अधिक उलझा दिया है। तकनीकी शिक्षा का मामूली ज्ञान नए आपराधिक कानून के हिसाब से कार्रवाई करने में परेशानी में डाल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक जांच की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले एएसआई/हैड कांस्टेबल पहले ही काफी कम हैं और जो हैं उनमें भी पचास फीसदी अभी तक इसमें पूरी तरह फिट नहीं हो पा रहे हैं। तकरीबन चार माह पहले इसे लागू किया गया है।

सूत्रों के अनुसार नए आपराधिक कानून में अनुसंधान पूरी तरह आडियो/वीडियो पर आधारित है। घटनास्थल से समूची रिकॉर्डिंग कर आईओ (जांच अधिकारी) को सीधे ऐप पर डालना है। यही नहीं सभी एविडेंस व बयान आदि भी इसी के जरिए लेने की कवायद है। एएसआई/हैड कांस्टेबल की तंगी इतनी है कि किसी थाने में दो-तीन घटनाएं एक साथ होने पर आईओ तक का टोटा है। नागौर (डीडवाना-कुचामन) में एएसआई के स्वीकृत पद 277 हैं पर कार्यरत है सिर्फ तीन दर्जन। कुछ का अभी प्रमोशन हुआ है जिनकी ट्रेनिंग होनी बाकी है। उसके बाद ही उन्हें थाने अलॉट किए जाएंगे।

इसी तरह करीब डेढ़ दर्जन पदोन्नति के बाद हैड कांस्टेबल बने हैं, उनकी ट्रेनिंग तो पूरी हो गई है पर अभी सभी को थाने नहीं मिल पाए हैं। करीब सत्तर फीसदी से भी अधिक एएसआई के पद रिक्त हैं , जबकि अनुसंधान में एएसआई की कड़ी को सबसे मजबूत माना जाता है। हैड कांस्टेबल के भी सौ पद रिक्त हैं। आलम यह है कि अनुसंधान का समय ही नहीं बढ़ा मुश्किलें भी बढ़ती जा रही है।

अभी तक समझ ही नहीं पाए पूरा कानून, देख रहे किताब

सूत्र बताते हैं कि आपराधिक धारा तक के लिए किताब देखनी पड़ रही है। कई बार पुलिस यह सोचकर असमंजस में पड़ रही है कि किस अपराधी के हथकढ़ी लगाएं और पोक्सो/बलात्कार के मामले में महिला चिकित्सा अधिकारी नहीं मिलने पर क्या करें? नए कानून में आरोपी को हथकड़ी लगाने के भी नियम तय किए गए हैं। बार-बार अपराध करने वाले समेत कुछ मामलों में ही पुलिस आरोपी को गिरफ्तार या कोर्ट में पेश करने के दौरान हथकड़ी लगाएगी। आदतन या बार-बार अपराध करने वाला या जो हिरासत से भागा हुआ हो उसे। इसके अलावा संगठित अपराध/आतंकवादी कृत्य के अलावा नशीली दवा से संबंधित अपराध, हत्या/बलात्कार एसिड अटैक, मानव तस्करी, यौन अपराधी के लिए ही हथकड़ी का इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसको लेकर भी बड़े अफसर भी नए कानून की किताब पर नजर डाल रहे हैं।

पेचीदगियां ऐसी कि खूब हो रहे परेशान

रिकॉर्डिंग में कहीं नेटवर्क नहीं मिल रहा तो कहीं आईओ के मोबाइल अपडेट/तकनीक में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। घटना पर आडियो-वीडियो रिकॉर्ड करने से लेकर अन्य पेचीदगियां अब भी कई बार समझ से बाहर होती हैं। कार्रवाई कोई भी हो वीडियोग्राफी करनी है, कई जगह नेटवर्क नहीं पकडऩे से मोबाइल नहीं चल रहे हैं तो कई जगह नफरी की इतनी कमी कि कोढ़ में खाज जैसी कहावत चरितार्थ हो रही है। असल में तकनीकी रूप से हर आईओ सुदृढ् नहीं है। हैड कांस्टेबल भी चालीस फीसदी तो दसवीं-ग्यारहवीं पास है। नए कानून के बारे में ही अभी उन्हें ठीक से पता नहीं है और उस पर बिना साधन-संसाधन के पूरी तरह से तकनीकी रिपोर्ट सबमिट करना उनके बूते के बाहर बना हुआ है। इसके लिए महीनों प्रशिक्षण चला।

साइबर मामले, बिना तकनीक के जांच अधिकारी

सूत्र बताते हैं कि साइबर थाने के अलावा गिने-चुने थानों में साइबर एक्सपर्ट कार्यरत हैं पर अधिकांश में एक लाख तक की धोखाधड़ी/साइबर ठगी के मामले दर्ज तो हो रहे हैं पर उनकी जांच ठीक ढंग से हो नहीं पा रही। वो इसलिए कि जांच अधिकारी इस तकनीक को पूरी तरह से नहीं जानते हैं।

इनका कहना

यह सही बात है कि अभी नए कानून और तकनीकी रूप से सभी हैड कांस्टेबल/एएसआई रफत में नहीं आ पाए हैं। थोड़ा समय लगेगा। तकनीकी रूप से दक्ष कांस्टेबल उनकी मदद करते हैं। थोड़ा समय अधिक लग रहा है पर नए कानून की पूरी पालना की जा रही है।

-नारायण टोगस, एसपी नागौर।

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